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डीटीसी पर भारी पड़ी ब्लू लाइन

पहले से ही घाटे में चल रही डीटीसी बस बेड़े की बसों ने रक्षाबंधन पर बहनों को मुफ्त यात्र का तोहफा देने का ऐलान भले ही किया लेकिन मुनाफा ब्लू लाइन बसों के हिस्से में आया। रक्षाबंधन में ठसाठस बसें भरकर ब्लू लाइन के ड्राइवर कंडक्टर बसे दौड़ाते रहे। दूसरी तरफ डीटीसी की बसें सवारी के लिए तरस गयीं। डीटीसी की तीस फीसदी बसों के डिस्प्ले बोर्ड तक नहीं प्रदर्शित कर रहे थे कि लो फ्लोर बस कहां तक जायेगी।


दिल्ली सरकार ने रेलवे की तर्ज़ पर रक्षाबंधन के दिन महिलाओं को मुफ्त यात्र की सुविधा देकर वाहवाही लूटने की कोशिश की । लेकिन काहिल कर्मचारियों,अपने ग़ैर पेशेवराना रवैये और बिना किसी कार्य योजना के रस्म अदायगी करने वाली डीटीसी के अफसरों की वजह से डीटीसी ने घाटे की राखी बांधी। सारा मुनाफा डीटीसी की प्रतिद्वंदी दिल्ली मेट्रो और ब्लू लाइन बस मालिकों के हिस्से में आया।


डीटीसी के पास करीब 3800 बरें हैं। विभागीय दावा है कि रक्षाबंधन पर बस बेड़े की 3225 बसें सड़कों पर दौड़ी हैं। अगर डीटीसी के दावों पर यकीन कर लें तो फिर इस बस बेड़े की बसें खाली और ब्लू लाइन बसें ठसाठस भरी हुईं क्यों थीं। मुफ्त यात्र के नाम पर महिलाओं को डीटीसी की बसों में सवारी करनी चाहिए थीं लेकिन ऐसा हुआ नहीं। चर्चा तो यहां तक है कि मिलीभगत के चलते लो फ्लोर और डीटीसी की बसों के आगे-आगे ब्लू लाइन बसें सवारी बटोरती चलीं और पीछे-पीछे डीटीसी की बसे अपनी चाल से चलीं।

आनन्द विहार बस अड्डे से खाली चलीं अधिकांश लो फ्लोर बसों के डिस्प्ले बोर्ड ही काम नहीं कर रहे थे। कई खाली बसों में ड्राइवर-कंडक्टरों ने सीएनजी ख़त्म होने की बात कहकर सवारियों को टरका दिया। मजबूरन सवारियां ब्लू लाइन में सवार होने को मजबूर हुईं।

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