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हमारे सामर्थ्य की परीक्षा है बाघ

क्या भारत बाघों को बचा सकता है? यह सवाल सिर्फ भारत ही नहीं उसकी सीमाओं के बाहर भी महत्वपूर्ण है। यह सवाल विकास की उस राह से भी जुड़ा है, जो एशिया ने पकड़ी है। इस सवाल के जवाब से इस बात की परख भी हो जाएगी कि हमारे विशेषज्ञों की फौज और हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी प्रभावी हैं। इस सवाल के लिए कई सदी पहले का अतीत महत्वपूर्ण नहीं है। सदियों तक इंसान और मांसाहारी शिकारी जंगली जानवरों की लड़ाई चली है।

तमिलनाडु के बच्चे आज भी बोमाका नाम की उस पराक्रमी भैंस की कहानी सुनते हैं, जिसने एक बाघ का मुकाबला करके अपने बछड़े की जान बचाई थी। लेकिन इस सवाल के लिए इसका कोई अर्थ नहीं। वाल्मीकी रामायाण में राम और लक्ष्मण का जिक्र बाघ की तरह हुआ है। दो सदी पहले अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शासक टीपू सुल्तान ने बाघ को अपने राज्य का प्रतीक बनाया था। और जब आजद हिंद फौज को एक प्रतीक की जरूरत पड़ी तो सुभाष चंद बोस ने फुर्तीले बाघ को ही चुना।

लेकिन पिछली सदी में यह कहानी पूरी तरह से बदल गई। भारी तादाद में बाघों को राजओं, राजकुमारों और ब्रिटिश अफसरों ने मारा। दशकों तक सरकार बाघ, बाघिन और शावकों को मारने पर ईनाम देती रहीं। एक सदी पहले तक साल भर में 1600 के करीब ऐसे बाघ मारे गए , जिनके लिए बाकायदा ईनाम बंटे। ये आंकड़ा अतिश्योक्ति भरा है, क्योंकि यह बाघों की कुल संख्या से ज्यादा है।

भारत का नाम उन देशों में है, जो सबसे पहले बाघ को बचाने की मुहिम में शामिल हुए। 1972 में इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया और एक साल बाद इसके लिए कई आरक्षित अभयारण्य बनाए गए। आज ये आरक्षित अभयारण्य ही हैं, जहां बाघ सुरक्षित रह सकते हैं। ये अभयारण्य कुदरत के अध्ययन की प्रयोगशाला हैं। इसके पीछे की सोच बाघ को महत्वपूर्ण मानकर बचाने की नहीं है, बल्कि यह कुदरत को बचाने की इंसानी कोशिश का एक हिस्सा है। बाघ भारत के पर्यावरण और संस्कृति की विविधता का प्रतीक है।

इस समय भारत में 40 हजर किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है, जिसमें बाघ रह सकते हैं। इस जंगल में कटान और खेती की इजजत नहीं है। यहां न खनन हो सकता है, न बांध बनाए जा सकते हैं, न राजमार्ग बन सकते हैं और न विद्युत संयंत्र। पर्यावरण में बदलाव की नई चिंता जो दुनिया भर में दिखाई दे रही है, उसमें इस तरह के जंगल बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे हमें बताते हैं कि कुदरत कैसे काम करती है। जिसे हम प्रोजेक्ट टाइगर कहते हैं उसका महत्व महज बाघ से कहीं ज्यादा है। 1973 में जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस प्रोजेक्ट की शुरूआत की थी तो उन्होंने कहा भी था कि यह परियोजना विडंबनाओं से भरी  है। इस जंगल के साथ जिस पशु की पहचान जुड़ी है, वह खुद खतरे में हैं और उसे बचाने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है।

चार साल पहले जब एक पार्क में बाघों के सफाए की खबर आई थी तो प्रधानमंत्री ने टाइगर टास्क फोर्स का गठन किया था। इसके साथ ही वह शुरूआत हुई थी, जिसमें वज्ञानिकों और नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण की कोशिशों में शामिल किया गया। इस लिहाज से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का यह बयान काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बाघों के बारे में आकलन करने में विज्ञान का इस्तेमाल बहुत ज्यादा नहीं हुआ है। वैसे भी जंगल में रहने वाली ऐसी किसी आबादी के लिए सटीक आकलन आसान भी नहीं है। पिछले तीन दशकों से भारत के जंगलात से जुड़े लोग खुरों के निशान से ही बाघों की पहचान और उनकी संख्या के अनुमान लगा रहे हैं।

वैसे बाघों की पहचान की कैमरा ट्रैप तकनीक का इस्तेमाल कई भारतीय वैज्ञानिकों ने किया लेकिन यह इस्तेमाल सीमित स्तर पर ही हुआ। ऐसी तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाना जरूरी है। इस लिहाज से मंत्री का बयान स्वागत योग्य तो है लेकिन सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि आने वाले समय में संरक्षण के लिए विज्ञान का इस्तेमाल कितना और किस तरह से किया जाता है। दक्षिण एशिया के सभी देश, चीन और रूस वगैरह सभी ने नई तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, लेकिन हमारे देश में इसे अभी नजरंदाज किया जा रहा है।

क्या यह वाकई महत्वपूर्ण है कि हम बाघों और उनके शिकारों की संख्या का आकलन कैसे-कैसे करते हैं। नि:संदेह यह महत्वपूर्ण है। इससे हमें यह पता चलता है कि हम जो नीतिया अपना रहे हैं, वे सही नतीजे दे रही हैं या नहीं। खुर्रा जंच की तकनीक उस समय की है जब शिकार बाघ का पीछा किया करते थे, उन्हें बचाने के युग में ये ज्यादा काम नहीं आने वाली। नई तकनीक हमें यह बता सकती है कि जंगल किस दिशा में विकसित हो रहा है।

लेकिन यह एक छोटा सा ही कदम होगा। विज्ञान उसी समाज में सही अंजम दे पाता है जिसमें नए विचारों के लिए खुलापन हो। हमारे पास जविक और सामाजिक दोनों ही तरह की विशेषज्ञता है और हम 1970 से इस दिशा में लगातार कोशिश भी कर रहे हैं। इस बात को अक्सर अनदेखा कर दिया जता है कि चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के हमसे कहीं ज्यादा अमीर देशों के पास बहुत बड़े जंगल हैं लेकिन वन्य जीवों के मामले में वे लगभग खाली पड़े हैं। अभी भी भारत और उसके पड़ोसी देश ही हैं, जहां बाघ और गैंडे जसे जीवों को काफी हद तक बचाया ज सका है। यह महज अद्भुत किस्म के जंगली जीव को बचाने भर का मामला ही नहीं है, यह देश की जेनेटिक संपदा को बचाने का मामला भी है। ये कुदरत के वे खजने हैं जहां न जने कितनी जनकारियां भरी पड़ी हैं- जीव जगत की जनकारियां, जीव-, जंतुओं, पेड़-पौधों और कीट-पतंगों की आपसी रिश्तों की जानकारियां।

बाघ को बचाने का मामला सिर्फ एक प्रजति को बचाने भर का मामला नहीं है, यह ऐसे मामलों में हमारी सोच और सामथ्र्य की परीक्षा भी है। इसके लिए कुशल प्रबंधन की जरूरत भी है ताकि महज इसी वजह से वनवासियों को उनके अधिकारों और आवास से बेदखल न किया जाए। 2009 का भारत एक अमीर भारत है। 1973 के मुकाबले इसकी आबादी भी काफी ज्यादा है और यह विकसित भी काफी हो गया है। पर अब उसे ऐसी महारत और ऐसे नागरिक संस्थानों की जरूरत है जो विज्ञान का सटीक इस्तेमाल करके बाघों को बचा सकें।

rangarajan.mahesh @gmail. com

लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता हैं।

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