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27 मई, 2020|5:30|IST

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समाज : वकीलों पर सोच बदलनी होगी

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मसले पर इतिहास रचनेवाले श्रीलंका के चर्चित साप्ताहिक अख़बार ‘सण्डे लीडर’ को अपने बेबाक रवैये की काफी कीमत चुकानी पड़ रही है। ताज़ा ख़बर यह है कि ‘सण्डे लीडर’ के खिलाफ ‘सेना की बदनामी और अदालत की अवमानना’ जैसे चल रहे मुकदमों में उसकी वकालत कर रहे वकीलों को निशाने पर लिया गया है। श्रीलंका के रक्षा, जनसुरक्षा, कानून और व्यवस्था मंत्रालय की वेबसाइट पर इन वकीलों के खिलाफ बाकायदा लेख छपे हैं, जिसमें कहा गया है कि किस तरह ‘काले कपड़े पहने ये देशद्रोही इकट्ठे हुए हैं’। इतना ही नहीं रक्षा मंत्रालय की तरफ से लिखे गए एक अन्य लेख ‘हू आर द ह्यूमन राइट्स वॉयलेटर्स’ में यह बात भी कही गयी कि आतंकवाद के सन्देह में गिरफ्तार लोगों के मामले को देखने वाले वकील ही आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े हैं।

लेकिन क्या यह पहली दफा है कि वकीलों को सरकारी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा है, जब वे संविधानप्रदत्त अधिकारों के जरिए अभियुक्त बनाए लोगों के मामलों का केस लड़ रहे हों? अपने देश में इसका एक और आयाम हम देखते हैं, जिसके तहत राज्य ही नहीं बल्कि नागरिक समाज ऐसी स्थितियां पैदा करता दिखता है कि वकील अपनी पेशागत जिम्मेदारियों का निर्वहन सन्तुलित ढंग से न करें। कई बार ऐसी सरगर्मियों में वकीलों का एक हिस्सा भी साथ देता दिखता है।

पिछले कुछ वर्षों से देश के अलग-अलग हिस्सों में एक के बाद एक वकीलों के संगठन अर्थात बार एसोसिएशन्स यह प्रस्ताव पारित कर रही हैं कि वह खास किस्म के मामलों में अभियुक्तों की पैरवी नहीं करेंगी, यहां तक कि अगर इस प्रस्ताव का उल्लंघन होता दिखे तो वे पुरजोर विरोध करेंगी।

पहले बार एसोसिएशनों की ऐसी प्रतिक्रिया स्वत:स्फूर्त किस्म की नज़र आती थी, जिसमें मुद्दाविशेष को लेकर लोगों की भावनाओं का उसमें अधिक प्रतिबिम्बन होता था। उदाहरण के तौर पर कुछ साल पहले महाराष्ट्र के सांगली जिले का एक मामला चर्चित हुआ था, जहां किसी दबंग युवक द्वारा किसी किशोरी की बर्बर हत्या से उपजे आक्रोश और पुलिस की लीपापोती के बाद वकीलों के संगठन ने ऐलान किया था कि वह आरोपी युवक के मामले को नहीं उठाएगी। कुछ साल पहले कश्मीर के श्रीनगर में उजागर हुए यौन शोषण के एक बड़े गिरोह के बाद उसी किस्म की स्थिति बनी थी। अब ऐसी प्रतिक्रिया उन मामलों में ज्यादा नज़र आ रही है जिसका ताल्लुक कहीं न कहीं ‘आतंकी घटनाओं’ से है, जिसमें एक समुदायविशेष का हाथ बताया जाता हो।

अयोध्या में 2005 में अस्थायी मन्दिर पर आतंकी हमले के बाद फैजाबाद बार एसोसिएशन द्वारा पारित प्रस्ताव ने इस सिलसिले की शुरूआत की, जब उसने ऐलान किया कि इस हमले के आरोपियों के मामलों में वह पैरवी नहीं करेंगे। काफी समय बाद जब इस मामले में अभियुक्तों की तरफ से वकीलों की एक छोटी टीम पहुंची तो बार एसोसिएशन के लोगों ने उन पर बाकायदा हमला कर उन्हें वहां से पलायन पर मजबूर किया।

वर्ष 2006 में जब वाराणसी में संकटमोचन मन्दिर और रेलवे स्टेशन पर आतंकी हमले की वारदात हुई, तब इस सिलसिले में गिरफ्तार वलीउल्ला के मामले की सुनवाई जब शुरू होने को थी, तब यही सिलसिला दोहराया गया। 22 नवम्बर 2007 को जब वाराणसी, लखनऊ और फैजाबाद की कचहरियों में बम धमाके हुए तब लखनऊ और बाराबंकी के बार एसोसिएशन भी इस प्रस्ताव के साथ हो लिए।

दरअसल न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका से गठित राज्यसत्ता और नागरिकविशेष के बीच कायम वकीलनुमा सेतु या कानूनी सहायता का मामला अनुपस्थित हो जाए तो आम नागरिक पर किस किस्म का कहर बरपा हो सकता है, इसका आकलन संविधान निर्माताओं ने किया था। यह कहा जा सकता है कि हमारा संविधान ऐसे सकारात्मक कदम उठाने की बात करता है ताकि सभी व्यक्तियों की व्यवस्था तक समान पहुंच हो। आपराधिक न्याय प्रणाली में आमतौर पर ऐसी स्थिति तब उभरती है, जब अभियुक्त- आर्थिक, सामाजिक तौर पर समाज के सबसे कमजोर तबकों से सम्बधित हो। इसी सन्दर्भ में आर्थिक और अन्य कमजोरियों से पीड़ित लोगों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित करने पर संविधान में जोर दिया गया है।

हमें याद रखना होगा कि महात्मा गांधी, इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी शख्सियतों की हत्या के बाद चले मुकदमों में भी आनन-फानन फैसला नहीं सुनाया गया बल्कि मुकदमे की विधिवत प्रक्रिया चली थी। हत्यारों या हत्या की साजिश रचनेवालों को भी वकील के जरिये अपनी बात कहने का संवैधानिक अधिकार दिया गया था और उसके बाद ही उन्हें सजा हुई। अगर संविधान की मूल भावना के साथ न्याय करने के लिए तत्पर वकीलों को ‘देशद्रोही’ या ‘आतंकवाद के समर्थक’ किस्म के लेबल चस्पां किए गए होते तो निश्चित ही हम अलग परिणति तक पहुंचते।

subhash_gatade @rediffmail. com

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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