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साहित्य की जाति

हिंदी साहित्य के काफी बुरे दिन चल रहे हैं। यह वाक्य ‘बुरे दिन चल रहे हैं’ इसलिए भी लिखा है कि यह हिंदी साहित्य का बुनियादी सूत्र है और इससे सभी लेखक सहमत होंगे। आजकल हिंदी साहित्य में बुरे दिनों की वजह बाजारवाद और उपभोक्तावाद बतायी जाती है, कुछ सालों पहले तक पूंजीवाद को इसका दोषी बताया जाता था, उसके पहले आधुनिकता को बुरे दिन बताया जाता था।

हिंदी साहित्य के बुरे दिनों से निकलने का एक नुस्खा मुझे सूझ है। हिंदी साहित्य की बुनियादी समस्या यही है कि हिंदी क्षेत्र में उसके लिए छोटे-छोटे ठिकाने ही बने हैं और उन्हीं पर कब्जे के लिए या वहां बने रहने के लिए मार-काट मची है। ऐसे में थोड़ी व्यापक जमीन हासिल हो जाए तो मार-काट कम हो सकती है। इसके लिए मुझे नुस्खा मिला एक निमंत्रण पत्र से। यह निमंत्रण पत्र किसी वैश्य संगठन का है, जो मैथिलीशरण गुप्त के नाम पर पुरस्कार दे रहे हैं। मेरा सुझाव यह है कि चूंकि हिंदी साहित्य की जगह कम हो गई है लेकिन जाति आधारित संगठन मजबूत होते ज रहे हैं, ऐसे में लेखक अपनी-अपनी जाति के संगठन से जुड़ जाएं और संगठन की शक्ति से लाभान्वित हों।
जिन लेखकों को प्रगतिशील लेखक संघ या जनवादी लेखक संघ की सदस्यता का अनुभव है, उन्हें तो ज्यादा अटपटा भी नहीं लगेगा। जति आधारित संगठन लेखक संघों से थोड़े ज्यादा उदार होते हैं। वैसे भी काफी लेखक हैं, जो प्रगतिशील या जनवादी होते हुए जतिवादी भी हैं, उम्मीद है कि लेखक संघ ऐसे में दोहरी सदस्यता का विवाद नहीं उठाएंगे।

कितना बढ़िया होगा, जब डॉ. रामविलास शर्मा का झंडा ब्राrाण महासभा उठाएगी और प्रसाद जी वश्य महासभा के लिए पूज्य होंगे। महादेवी वर्मा कायस्थ महासभा की प्रतीक हो सकती हैं। नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह क्षेत्रीय महासंघ में ठाकुर अमर सिंह के साथ हाथ में तलवार लेकर फोटो खिंचवा सकते हैं और राजेन्द्र यादव किस संघ में होंगे, उनके नाम से ही स्पष्ट है।

भारतीय संस्कृति के झंडाबरदारों में कई लेखक हैं, जो सिद्ध कर सकते हैं कि जाति आधारित संगठनों से जुड़ना ही साहित्य की सही दिशा है जिससे लेखकगण अंग्रेजी राज के दौरान भटक गए थे। प्रगतिशील पत्रिकाएं सिद्ध कर सकती हैं कि लूकाच और वाल्टर बेंजमिन यही कहते थे। यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि विभिन्न जातियां दरअसल विभिन्न राष्ट्रीयताएं हैं, जो अपनी पहचान और स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रही हैं। थोड़े उग्र लेखक चाहें तो रणवीर सेना, लोरिक सेना और परशुराम सेना से रिश्ता जोड़ सकते हैं। अपनी इस ठेठ भारतीय परंपरा से जुड़िए और साहित्य को व्यापक बनाइए।

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