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अनिवार्य शिक्षा की पहुंच

लोकसभा ने मंगलवार को अनिवार्य शिक्षा के ऐतिहासिक विधेयक को मंजूरी दी है, इसका अहसास न तो हमारे जनप्रतिनिधियों में दिखाई पड़ा न ही मीडिया में। जैसे राज्यसभा में 54 सांसदों की मौजूदगी में यह विधेयक पास हुआ था, उसी तरह लोकसभा में भी मात्र 113 सदस्यों की उपस्थिति में बिल पास हुआ। उसी तरह का ठंडा उत्साह मीडिया में भी देखा गया।

आखिर जिस विधेयक का भारतीय लोकतंत्र ने साठ साल तक इंतजार किया उसके आने पर ऐसा फीका स्वागत क्यों? क्या यह विधेयक इतना सक्षम नहीं दिख रहा कि शिक्षा के राष्ट्रीय स्वप्न को साकार कर सके? दरअसल इस विधेयक को लेकर दाएं और बाएं दोनों बाजू के शिक्षाविदों और नीतिकारों ने आशंकाएं जताई हैं। एक तरफ इससे निजी स्कूलों की गुणवत्ता और शिक्षा में निजी निवेश घटने की चिंता जताई गई है तो दूसरी तरफ गरीब बच्चों को घटिया दर्जे के स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर करने का आरोप लगाया गया है।

अनुच्छेद-21 के तहत शिक्षा को जीवन और निजी स्वाधीनता की तरह मौलिक अधिकार बनाए जाने के लिए जिस बड़ी धनराशि की जरूरत होगी, उसकी कोई स्पष्ट व्यवस्था भी नहीं दिख रही है। केंद्र और राज्य के बीच इस बारे में तालमेल या स्पष्ट वितरण नहीं है। ¨चता विकलांगों और तीन साल से छह साल के बच्चों को लेकर भी है। वास्तव में यह विधेयक अपने आप में कोई जदू की छड़ी नहीं है कि जिसे घुमाते ही सारे बच्चे पढ़ने लगेंगे। इसके लिए हमारी सरकारों और सामाजिक संस्थाओं को मिल कर प्रयास करना होगा।

देखा जाए तो यह सब आशंकाएं वैसी हैं, जैसी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के लिए व्यक्त की गई थीं या प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बारे में व्यक्त की जा रही हैं। आशंकाओं के बावजूद नरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने और बाढ़, सूखा जसी विपरीत प्राकृतिक स्थितियों में भी लोगों को भुखमरी से बचाने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। उसी तरह अगर केंद्र सरकार में इच्छा शक्ति है तो वह राज्यों के सहयोग से बुनियादी शिक्षा के ढांचे को दुरुस्त कर लोगों के सबलीकरण और देश को आगे ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। निश्चित तौर पर राज्यों या निजी स्कूलों का सहयोग प्राप्त करने में कई तरह की पेचीदगियां सामने आएंगी पर अगर इस मामले में राजनीतिक खींचतान को किनारे रख कर जनहित को सामने रखा जाए तो कोई वजह नहीं कि यह स्वप्न साकार न हो सके।

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