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महामारी का डर

पुणे में स्वाइन फ्लू से एक किशोरी की मौत में क्या अस्पतालों की लापरवाही रही है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन इसकी वजह से स्वाइन फ्लू की दहशत फिर से सवार हो गई है। हालांकि अभी तक देश में स्वाइन फ्लू के लगभग पांच सौ ज्ञात मरीजों की तादाद में एक मौत ज्यादा शोर शराबे का कारण नहीं बनना चाहिए, लेकिन इससे यह धारणा टूट गई कि भारत में स्वाइन फ्लू का वायरस इतना खतरनाक नहीं है कि वह जान ले सके।

बड़ी दिक्कत यह है कि अभी इस रोग की शुरुआत हुई है और आने वाले दिनों में ठंड और नमी बढ़ने से यह ज्यादा फैल सकता है। इन्फ्लूएंज वायरस के बारे में यह बताना मुश्किल भी होता है कि उसका संक्रमण भविष्य में क्या रूप धारण करेगा। लेकिन दो बातें साफ हैं और वे दहशत कम करने के लिए काफी हैं, एक भारत में आम तौर पर यह वायरस घातक रूप में नहीं है, दूसरे इसका इलाज रैमिफ्लू नामक दवा से संभव है। चूंकि सरकार ने अब स्वाइन फ्लू के संभावित मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना गैर जरूरी करार दे दिया है और दूसरी ओर पुणो में किशोरी की मौत से जगरूकता भी पैदा हुई है, इसलिए संभव है कि ज्यादा लोग जांच के लिए अस्पतालों में आएं और स्वाइन फ्लू के मरीजों का आंकड़ा भी तेजी से बढ़ता हुआ दिखे।

वैसे भी शुरुआती दौर के बाद मरीजों को अलग-थलग करके रोग का प्रसार नियंत्रित करने की कोशिशें ज्यादा कामयाब नहीं होतीं, क्योंकि अब तक बहुत हल्के-फुल्के लक्षणों वाले कई मरीज संक्रमण फैला चुके होंगे। अब जोर मरीजों की पहचान और उनके इलाज पर होना चाहिए, जो कि सरकार की रणनीति दिख रही है। हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि इससे अगले दिनों में स्वाइन फ्लू का प्रकोप सीमित रहेगा, क्योंकि तीन-चार महीने में इसका टीका उपलब्ध हो जाएगा और वह सर्दियों में रोग की दूसरी लहर अगर आई तो उसे रोक सकेगा। चूंकि पुणो में एक मृत्यु हो चुकी है इसलिए वहां इस संक्रमण को ‘एपिडैमिक’ घोषित करना ठीक हो सकता है लेकिन सारे देश में दहशत फैलाने की कोई जरूरत नहीं है।

जरूरत यह है कि संभावित मरीज स्वेच्छा से अस्पताल पहुंचें, उनकी जांच हो और जरूरी होने पर उनका उपचार हो। पिछले ज्ञात इतिहास में इन्फ्लूएंज के एपिडैमिक में बीमार होने या मरने वालों की तादाद से इस बार बहुत कम लोग ही शिकार हुए हैं। चिकित्सा विज्ञान में हुई यह तरक्की हमें भरोसा दिलाने के लिए काफी है।

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