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जनेऊ पूर्णिमा के रूप में रक्षाबंधन

जनेऊ पूर्णिमा के रूप में रक्षाबंधन

कुमाऊं  में रक्षाबंधन जनेऊ पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। हालांकि नगरीय क्षेत्र में अब यह भाई-बहन के त्योहार के रूप में ही मनाया जाता है, लेकिन अलमोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ के गांवों में यह नया जनेऊ धारण करने और पुरोहित द्वारा यजमान को रक्षासूत्र बांधने का पर्व है। श्रावणी पूर्णिमा अर्थात जनेऊ पूर्णिमा के दिन गांव के बुजुर्ग नदी या तालाब के पास एकत्र होते हैं, जहां पंडित मंत्रोच्चार के साथ सामूहिक स्नान और षि तर्पण कराते हैं। इसके बाद नया जनेऊ धारण किया जाता है। बाड़ेछीना क्षेत्र में रक्षाबंधन के दिन षितर्पण कराते आ रहे पंडित पूरन चन्द्र डालाकोटी बताते हैं कि सामूहिक रूप से जनेऊ की प्रतिष्ठा और तप करने के बाद जनेऊ बदलने का विधान लोगों को आपसी मतभेदों को भुलाने और परस्पर सद्भाव बढ़ाने का संदेश देता है। अर्थात बीते साल में जो भी कटुता आपसी संबंधों में आ गई है, उसे पुरानी जनेऊ के साथ उतार देना और नए जनेऊ के साथ आपसी प्रेम और सद्भाव बढ़ने के लिए प्रेरित करना होता है।

ऋषितर्पण और जनेऊ धारण करने के अलावा इस दिन पंडित अपने यजमानों के घर-घर जाकर रक्षा धागा बांधते हैं। रक्षाधागा बच्चों, बूढ़ों तथा महिलाओं सभी को बांधा जाता है। पचार बागेश्वर निवासी पंडित शंकर दत्त पाण्डे कहते हैं कि रक्षा का यह धागा मंत्रोचारण (एनबद्धोबलीराजा दानवेन्द्रों महाबल:, तेनत्वाम् अपिबंधनामि रक्षे मांचल मांचल:) के साथ कलाई पर बांधा जाता है, जिसमें अनादि शक्ति जगदीश्वर, षिमुनि, माता-पिता तथा प्रकृति से प्रार्थना करते हुए वेद मंत्रों को आमंत्रित कर रक्षा सूत्र को धारण करने वाले और सम्पूर्ण संसार की रक्षा की कामना की जाती है।

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