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साझा बयान का राजनय और राजनीति

शर्म-अल-शेख में गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ बातचीत के बाद डॉ. मनमोहन सिंह ने जो संयुक्त वक्तव्य जारी किया, वह शुरू से ही विवादास्पद बन गया है। चंद लोगों का मानना है कि उन्होंने एक दूरदर्शी और ऐतिहासिक पहल की है जो पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्तों को आमूलचूल बदल सकती है। पहली बार पाकिस्तान में ‘क’ शब्द का प्रयोग नहीं किया, अर्थात इस मंच से कश्मीर विवाद के अंतर्राष्ट्रीयकरण का प्रयत्न नहीं किया।

दूसरी ओर भारी बहुमत आलोचकों का है, जिनके अनुसार पाकिस्तान के साथ संवाद फिर से शुरू करने की उतावली में मनमोहन सिंह ने देश के राष्ट्रहित को कुर्बान कर दिया। पाकिस्तान ने इस संयुक्त वक्तव्य में भारत को यह स्वीकार करने के लिए राजी कर लिया कि भारत-पाक सुलह वार्ताओं को आतंकवाद के मुद्दे से अलग-थलग रखा जाएगा। इसके अलावा पहली बार इस तरह के बयान में ‘ब’ शब्द का इस्तेमाल खतरनाक ढंग से किया जा सका है। ‘ब’ शब्द अर्थात् बलूचिस्तान।

अधिकांश सामरिक विशेषज्ञ इस बारे में एकमत हैं कि अब पाकिस्तान भविष्य में कभी भी उपद्रवग्रस्त कश्मीर की बराबरी उपद्रवग्रस्त बलूचिस्तान से कर सकता है और जम्मू कश्मीर राज्य में दहशतगर्दी के लिए घुसपैठिए पाकिस्तानी अलगाववादियों के बारे में आरोप लगाए जाने पर भारत पर भी इसी तरह के लांछन लगा सकता है। वास्तव में यह बात समझ पाना बेहद कठिन है कि देश के विभाजन के छ: दशक बाद क्यों उभयपक्षी वार्ताओं में बलूचिस्तान का जिक्र जरूरी हुआ है, जो अब तक इस फसाने में नागवार गुजरी थी।

यह बात किसी से छिपी नहीं कि बेचारे मनमोहन सिंह हिलरी क्लिंटन की भारत यात्रा के पहले यह दर्शाना चाहते थे कि भारत-पाक संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में उन्होंने कुछ सार्थक कदम उठाए हैं। जी-8 शिखर सम्मेलन में जो प्रस्ताव पारित किया गया था, उससे यह बात साफ हो चुकी थी कि अगर भारत विदेश नीति विषयक मुद्दों पर इस नये दोस्त की राय नहीं मानेगा या इस मामले में नानुकर करेगा तो परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग वाले करार की राह में रोड़े अटक सकते हैं। कुल मिलाकर इटली में अप्रस्तुत होने के बाद हमारे प्रधान मंत्री की मजबूरी गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन वाले मंच पर राजनयिक रूप से सक्रिय हो, किसी ठोस उपलब्धि के साथ लौटना बन चुकी थी।

इस मौके पर अपने भाषण में मनमोहन सिंह ने अनेक महत्वपूर्ण सार्वभौमिक मुद्दों का उल्लेख किया, जिससे पहली नज़र में ऐसा लगा कि वह गुटनिरपेक्ष आंदोलन में नई जान फूंकने का प्रयास कर रहे हैं। पर बहुत जल्दी यह बात साफ हो गई कि यह सब तो कलई उतरे बर्तन पर मुलम्मा चढ़ाना था। असली महारत तो भारत-पाक संवाद को फिर से शुरू करने तक सीमित था। इस बात को अनदेखा करना कठिन है कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़रदारी खुद शर्म-अल-शेख नहीं पहुचे थे।

रूस में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात के बाद वह खुद को शर्मसार महसूस कर रहे थे, क्योंकि मनमोहन सिंह ने भारत में पाकिस्तान प्रायोजित दहशतगर्दी के बारे में उन्हें उलाहना देना तभी शुरू कर दिया था, जब कैमरे वाले कमरे में मौजूद थे। और तुर्रा एक यह भी है कि अब पाकिस्तानी गुप्तचर संगठन आईएसआई ने भारत सरकार को यह सुझाना शुरू कर दिया है कि अगर वह दहशतगर्दी का उन्मूलन चाहती है तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से बात करने के बदले उन्हीं से संपर्क साधे।

खुद कांग्रेस के अनेक सदस्य भी इस नई अन्ताक्षरी से खिन्न है। उन्हें आलाकमान ने यह फरमान सुनाते देर नहीं लगाई कि उन्हें इस बारे में मुंह खोलने की जरूरत नहीं। जो कुछ कहना है, सरकार कहेगी। सोनिया दरबार से यह ऐलान होने में दसएक दिन लग गये कि इस संयुक्त वक्तव्य के विषय में पार्टी और सरकार में कोई मतभेद नहीं।

इस बीच इस बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों की व्याख्या के बारे में भारत और पाकिस्तान के बीच बुनियादी मतभेद सतह तक आ गए। हमारे विदेश सचिव यह कबूल करने को विवश हुए कि मसौदा तैयार करने में शायद कुछ गलती हो गई या गफलत रही हो। पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने यह सवाल पूछने में देर नहीं लगाई कि इस गफलत या गलती के लिए कौन जिम्मेदार है? अगर विदेश सचिव इसके लिए उत्तरदायी है तो इस्तीफा उन्हें ही देना चाहिए। अन्यथा वह अधीनस्थ अधिकारियों का नाम ले।

दिक्कत यह है कि बेचारे विदेश सचिव क्या करें। उनके सर पर तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सवार है- अवकाश प्राप्त पुलिस अफसर जिनका लेना-देना अन्तरराष्ट्रीय राजनीति से यह कुर्सी संभालने के बाद ही शुरू हुआ है। हमारे आत्ममुग्ध विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने यह फतवा दे डाला कि संयुक्त वक्तव्य को इतनी गंभीरता से लेने की क्या जरूरत है। आखिर यह कागज का एक टुकड़ा ही तो है! जबसे हमने यह ज्ञान प्राप्त किया है, हम खासे सदमे में है। हमारा मानना है कि शशि भाई की अदाएं नफीसा अली वाली और परिधानप्रेम पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल की टक्कर का है। मगर इस सबके साथ-साथ वह वर्षो संयुक्त राष्ट्र के चोटी के राजनयिक पद को सुशोभित कर चुके हैं।

अन्तरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य का बेकार कागज के टुकड़े के रूप में वर्णन बेहद अटपटा लगा। अगर यही कड़वा सच है, तब फिर प्रधान मंत्री की उपलब्धि का आधार क्या बचता है? आज भी अन्तरराष्ट्रीय राजनय में संधियां और संयुक्त वक्तव्य कागज़ का टुकड़ा भर होने के बावजूद महत्वपूर्ण समङो जाते हैं। उस परमाणविक ऊर्जा संबंधी करार समेत जिसको लेकर मनमोहन सिंह की पुरानी सरकार गिरते-गिरते बची थी।

हमें शर्म इस बात पर सबसे ज्यादा आती है कि हमारे नेतागण और आला अफसर चाहे नौजवान हो, अधेड़ या बूढ़े और चाहे कितने ही आलिम फाजिल होने का दावा क्यों ना करते हो, कभी भी जवाबदेह और जिम्मेदार आचरण करने से कतराते हैं। कहने को भारत जनतांत्रिक गणराज्य है पर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्ित अपने आचरण से निरंतर यही दर्शाते हैं कि उन्हें दरबारी चापलूसी शैली में अपना और देश का भला नज़र आता है। जब सोनिया जी ने यह इशारा कर दिया कि उनका हाथ हमेशा की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री की पीठ पर है तो सभी स्वामीभक्तों को सांप सूंघ गया है। ऐसे माहौल में राष्ट्रहित और विदेश नीति के बारे में तटस्थ पारदर्शी विश्लेषण कैसे संभव हो सकता है? प्राप्त बहुमत के बाद कांग्रेस का अहंकार और अदूरदर्शिता बार-बार झलक रही है।

pushpeshpant @ gmai. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।

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