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ब्लॉग वार्ता : बंगाल, पुलिस और गंगाजल

बंगाल की पुलिस हाथ से डंडा गिर जाने को अशुभ मानती है। जमीन पर गिर जाए तो गंगाजल से धोती है। इसलिए कई थानों में गंगाजल रखने का रिवाज है। पुलिस वालों के अंधविश्वास को कम्युनिस्ट फ्रेम से चटका कर अलग करते हुए प्रभाकर मणि तिवारी का यह लेख जोरदार हास्य पैदा करता है। पुरवाई पर इस लेख को पढ़ने के लिए क्लिक कीजिए,http://prabhakarmani.blogspot.com

प्रभाकर लिखते हैं कि बंगाल में पुलिस वाला हाजिरी रजिस्टर में शून्य से घबराता है। इसलिए वो दस बजे आ जाए तो पांच मिनट इंतजार करेगा और रजिस्टर में दस बजकर पांच मिनट लिखेगा। शून्य उसके लिए अपशकुन है। प्रभाकर का यह लेख गप्प नहीं है। वो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और एक मनोचिकित्सक के हवाले से लिख रहे हैं।

इसे पढ़कर लगा कि जरूर नंदीग्राम और सिंगुर के वक्त पुलिस के हाथ से डंडा गिर गया होगा और किसी ने गंगाजल से धोया नहीं होगा। नतीजा चुनाव में दिख गया है। महंगाई से घिरे भयंकर तनाव के इन पलों में हंसा ही जा सकता है। लेकिन प्रभाकर जी का यह ब्लॉग पढ़ा जाना चाहिए। वो हिंदी में पूर्वोत्तर की ऐसी खिड़की खोलते हैं कि जिससे आने वाली हवा हम सब के पूर्वाग्रहों से जमकर टकराती है।

प्रभाकर बंगाल, मेघालय, असम, मणिपुर, अरुणाचल, त्रिपुरा और सिक्किम को एक नई नजर से पेश करते हैं। हल्के से बता देते हैं कि सिक्किम विधानसभा देश भर में अकेली ऐसी विधानसभा हैं, जहां विपक्ष है ही नहीं। सारी सीटें सत्ता पक्ष के खाते में गई हैं। देखना चाहिए कि बिना विपक्ष के यह विधानसभा कैसे काम करती होगी।

पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं। लेकिन पुरवाई पर जाकर दोबारा से चुनाव की खबरों को पढ़ा जा सकता है। तभी पता चलेगा कि सुंदरवन के मौसुनी द्वीप के लोगों ने वोट इसलिए दिया ताकि सांसद समुद्र तट पर बांध बनवा दें और उनके द्वीप को डूबने से बचा लें। सुंदरवन के बारे में प्रभाकर बताते हैं कि हर चुनाव में यहां पुरुष मतदाताओं की संख्या कम हो जाती है। मर्द बाघ के शिकार हो जाते हैं। इसीलिए आरामपुर गांव का नाम विधवापल्ली कर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश और बिहार के मानस में बंगाल तो पड़ोस के गांव की तरह बसता है। सदियों और पीढ़ियों से हमारे यहां के लोग बंगाल और पूवरेत्तर की तरफ बसते चले गए लेकिन अपने कदमों के निशान यूपी बिहार के बिदेसिया गाने वालों की रचनाओं में छोड़ते चले गए। इसलिए पुरवाई पर जाकर लगता है कि जहां के बारे में लिखा जा रहा है, वहां कोई न कोई अपना गया होगा। प्रभाकर भी देवरिया के होकर सिलिगुड़ी में पले-बढ़े हैं। इसीलिए सिलिगुड़ी में सुपर मॉल खुलने की तस्वीर बहुत ही रोचकता से बयान करते हैं।

सिलिगुड़ी बदल रहा है। अंग्रेजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। दर्जन भर बार खुल गए हैं। चेरापूंजी तो हमारी किताबों का शहर है। प्रभाकर बता रहे हैं कि इसका नाम अब सोहरा किया जा चुका है। पानी की इतनी किल्लत हो गई है कि इजरायल की मदद ली जा रही है।

पूर्वोत्तर के स्कॉटलैंड मेघालय को अलग तरीके से पेश करते हैं। मेघालय में महिलाओं को पारंपरिक और कानूनी दोनों रूप से काफी अधिकार मिले हैं। लेकिन हर जिले में बलात्कार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। घरेलू हिंसा के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। इसके कारणों में बदलते समाज का तनाव भी होगा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया के जरिये ये सारी बातें बहस के केंद्र में नहीं आ पातीं।

प्रभाकर हमें टोटापाड़ा ले चलते हैं। भूटान की सीमा से लगे जलपाईगुड़ी जिले का यह गांव। जहां देश की सबसे कम आबादी वाली टोटो जनजाति रहती है। पश्चिम बंगाल को असम से जोड़ने वाली हाइवे से 21 किमी अंदर है, टोटापाड़ा।  आज तक यहां सड़क नहीं पहुंच सकी है। 1889 में सैंडर्स नामक अंग्रेज ने इस जनजाति का पता लगाया था। आज इनकी आबादी 1300 है, लेकिन सिर्फ 24 लोगों ने दसवीं तक की पढ़ाई की है।

लेकिन इन सबके बीच जीवन चल रहा है। प्रभाकर बता रहे हैं कि जादूगर पी सी सरकार जूनियर के रेस्तरां में अब भूत खाना परोसेंगे। यह होटल अभी चालू नहीं हुआ है लेकिन जब चालू होगा तो नरकंकालों की मुद्रा में मैनेजर और वेटर आपसे ऑर्डर लेंगे। अगर आप भूतों को ऑर्डर देने का सुख चाहते हैं तो इस होटल में जाने का आइडिया बुरा नहीं है। जब न्यूज चैनल वाले आइडिया की कमी की भरपाई भूत-प्रेत से कर सकते हैं तो पी सी सरकार जूनियर क्यों नहीं। यह वाकई पूरब का ब्लॉग है।

ravish@ ndtv . com

लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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