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स्नेह सूत्र का बंधन

‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वां अनुवद्धमि रक्षे माचल:, माचल:।’
श्रावण पूर्णिमा के दिन सभी अपना जनेऊ बदलते रहे हैं। उसी दिन पुरोहित यजमानों की कलाई पर कच्चे धागे को बांधते हुए कहते थे- ‘जिस धागे (रक्षासूत्र) को राजा बलि की कलाई पर बांध कर जगत जननी ने आजीवन रक्षित रहने का आशीर्वाद दिया था, वह दानवीर तथा महाबली था, उसी सूत्र को मैं तुम्हारी कलाई पर बांधता हू, तुम चंचल मत बनो। रक्षित रहो।’ परंतु मानो ब्राह्राणों से छीन कर इस रक्षा सूत्र को बहनों ने अपने भाई की कलाई पर बांधना प्रारंभ किया। समाज में हर व्यक्ति किसी न किसी संबंध में बंधा है। पति-पत्नी, भाई-बहन, माता-पुत्र, अनेक रिश्ते हैं। इन रिश्तों के अंदर अदृश्य सूत्र हैं। हम बंधे हैं, पर बंधन दिखता नहीं, गांठें चुभती नहीं।

कुछ ऐसे रिश्ते हैं, जो जन्म के बाद बंधते हैं। पर भाई-बहन का रिश्ता गर्भ का रिश्ता है। जन्म से पूर्व का। जन्म के बाद दूरिया बढ़ जाती हैं। इसलिए कई त्योहारों द्वारा उस रिश्ते को स्मरण कराया जाता है। सावन का महत्व जोड़ने का भी है। वर्षा से आकाश और जमीन का भी संबंध जुड़ता है। धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसी माह की अंतिम तिथि को रक्षा बंधन का त्योहार है।

सारा समाज भाई-बहनों के प्रीत भाव में बंधा है। इसलिए राखी बांधने वाली बहनों की रक्षा ही नहीं समाज की सभी स्त्रियों की रक्षा के भाव उस दिन उत्पन्न करने की अपेक्षा होनी चाहिए। उत्सव में उमंग के साथ कर्तव्य भाव भी निहित होता है। रक्षा बंधन हमें एक-दूसरे से प्रीत की डोर में बंधे रहने का संदेश देता है। देवी-देवताओं, राजा-रानियों, हिन्दू रानी-मुस्लिम बादशाह के बीच मनाया गया रक्षा सूत्र का प्रसंग अब भाई-बहनों के बीच कैद है। इसे जीवन के हर क्षेत्र में बंधा महसूस होना चाहिए। एक रक्षक और दूसरा रक्षित है। दोनों की भूमिका भी बदलती रहती है। कभी-कभी भाई भी रक्षित होता है और बहन रक्षक।

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