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अदालत का आइना

हर बार चुनाव के मौके पर जब विभिन्न दलों के और यहां तक कि निर्दलीय उम्मीदवार भी अपनी अपनी आमदनी और संपत्ति का ब्योरा देते हैं तो हम सुप्रीम कोर्ट के शुक्रगुजार होते हैं। यह सुप्रीम कोर्ट की बदौलत ही मुमकिन हो सका कि हमारे रहनुमा बनने की ख्वाहिश रखने वालों की माली असलियत सामने आए। वरना सभी राजनैतिक दलों ने इस प्रावधान को रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह ठीक है कि इस प्रावधान से कोई बड़े तीर नहीं मारे गए।

इससे न तो राजनैतिक भ्रष्टाचार पर रोक का कोई रास्ता खुला और न ही काले धन के किसी भंडार या आमदनी से बहुत अधिक संपत्ति का कोई मामला ही सामने आ सका। लेकिन यह प्रावधान इसलिए स्वागतयोग्य रहा है क्योंकि इसे सार्वजनिक जीवन को पारदर्शी बनाने वाला पहला महत्वपूर्ण कदम माना गया। और इसी के बाद यह उम्मीद की गई कि देश की न्यायपालिका इस रास्ते पर कुछ कदम और बढ़ाएगी। लेकिन जब मामला जजों की संपत्ति के ब्योरे का आया तो यही कदम ठिठकते दिखाई पड़े।

हालांकि जज अपनी संपत्ति का ब्योरा दें सुप्रीम कोर्ट इसके खिलाफ नहीं हैं, उसके जजों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा मुख्य न्यायाधीश के पास जमा भी कर दिया है। फिलहाल विवाद इस बात पर है कि यह ब्योरा सार्वजनिक रूप से जनता के लिए उपलब्ध होना चाहिए या नहीं। विवाद इस उलझन पर भी है कि जनता के पास यह ब्योरा जानने का अधिकार होना चाहिए या नहीं।

केंद्र सरकार ने इसके लिए जब संसद में बाकायदा विधेयक लाने का वादा किया था तो उम्मीद बंधी थीं। लेकिन सोमवार को राज्यसभा में जो विधेयक पेश किया गया वह उम्मीदों पर पानी फेरने वाला ही था। इस विधेयक में जनता को माननीय न्यायाधीशों की संपत्ति का ब्योरा जानने का हक नहीं दिया गया। और वहां जो तीखी बहस हुई उसने इस बिल के भविष्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया।

यह तर्क कि जजों की संपत्ति के ब्योरे का दुरुपयोग हो सकता है और इसका इस्तेमाल ईमानदार जजों को परेशान करने के लिए हो सकता है, अपने आप में बहुत मजबूत नहीं है, क्योंकि यह तो सांसदों और विधायकों के खिलाफ भी हो सकता है। अभी भी इस विधेयक से अच्छा हल यही है कि खुद न्यायपालिका सामने आए और सार्वजनिक जीवन को पारदर्शी बनाने की अपनी मुहिम आगे बढ़ाए। न्यायपालिका की चलाई गई इस मुहिम को ज्यादा दिन तक रोकना मुमकिन नहीं होगा।

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