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समाज में बहुत बदलाव नहीं होगा

समलैंगिकता के संदर्भ में सुधांशु रंजन  (समलैंगिकता : बदल जाएगा परिवार का स्वरूप) का लेख पढ़ा। लेखक ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विपक्ष में जो तर्क दिए हैं, उनसे सहमत होना कठिन है। वेश्यावृत्ति, परस्त्रीगमन और समलैंगिकता को उन्होंने एक ही नजरिए से देखने का प्रयास किया है। हालांकि तीनों परिस्थितियों में आपसी सहमति प्रमुख कारक है, परंतु यह भी उतना ही सच है कि वेश्यावृत्ति में एक पक्ष यह सहमति मात्र अपनी ‘आनंदानुभूति’ के लिए नहीं, वरन् जीविकोपाजर्न के लिए देता है। जबकि ‘परस्त्रीगमन’ की स्थिति में तीसरे पक्ष के अधिकार खतरे में आते हैं। उच्चतम न्यायालय का दृष्टिकोण यह कहीं नहीं कहता कि समलैंगिक संबंध दूसरे के मानवीय अधिकारों के उल्लंघन पर भी वध है। सुधांशु जी का तर्क सही है कि समलैंगिकता को मान्यता देने से परिवार और समाज का स्वरूप बदल सकता है, पर यह इतना भी नहीं बदलेगा जिससे पारिवारिक और सांस्कृतिक संरचना ध्वस्त हो जए। समलैंगिक संबंधों को मान्यता देने से सामाजिक संरचना और अधिक समावेशी होगी।
दीपमाला, जेएनयू, नई दिल्ली

बहुत याद आते हैं
‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई?’ शोले फिल्म का यह डायलॉग ए. के. हंगल ने बोला था। भारतीय सिने जगत में अवतार किशन हंगल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, किंतु जब भी उन्हें किसी फिल्म में देखा है तो चाचा, पिता, दादा के अभिनय में पाया। ‘बावर्ची’ फिल्म में अभिनेत्री के ताऊजी, ‘चितचोर’ में अभिनेत्री के पिता, ‘अवतार’ में राजेश खन्ना के बुजुर्ग मित्र, ‘शोले’ में उम्रदराज अंधा पिता, आमिर खान द्वारा बनाई गई फिल्म ‘लगान’ में गांव के सबसे बुजुर्ग पुरुष, आहट धारावाहिक में एक बुजुर्ग भूत की भूमिका को निभाया। मन में बार-बार ख्याल आता है भारतीय सिने जगत में 44 वर्ष देने वाले पद्मभूषण अवतार किशन हंगल का।
शक्तिवीर सिंह ‘स्वतंत्र’, नई दिल्ली

नौटंकी का अंत
आखिर इलेश की हुईं राखी सावंत, सीता जसे स्वयंवर को फिर किया जीवंत। शो पहुंचा टॉप टेन में, दर्शकों ने कहा, चलो रोज-रोज की नौटंकी का हुआ अंत।।
संजीव चंद, नई दिल्ली

कमाने-खाने दो
मैं राजनीति में कमाने खाने नहीं आया हूं - दिल्ली के महापौर कंवर सेन का एक बयान। बड़ी अच्छी बात है महापौर साहब। पर मेरी एक गुजरिश है कि दूसरों के पेट पर लात न मारो। उन्हें तो कमाने खाने दो।
इन्द्र सिंह धिगान,  दिल्ली

यूपी में हिटलरशाही
मुख्यमंत्री के इशारे पर बसपा कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के आपत्तिजनक बयान के बदले उनसे जो व्यवहार किया गया क्या वो सही था। मुख्यमंत्री का कार्य प्रदेश में शांति व्यवस्था को बनाए रखने का होता है न कि अशांति को फैलाने का, जो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने करवाया, क्या वह न्यायसंगत है? जिस प्रकार का विरोध उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने किया, उससे साफ जाहिर है कि वहां पर लोकतंत्र की जगह हिटलर तंत्र है। क्या बयान का जवाब देने का कोई और तरीका नहीं था?
आकाश नौटियाल, देहरादून

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