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अफसरों को ग्रामों में लगानी थी चौपाल

-डीएम तक को करना था सोशल आडिट
-सिर्फ कागजों में दौड़ रहीं ग्राम्य चौपाल

विकास कार्यो की जमीनी हकीकत जांचने के लिए अफसरों को गांव-गांव जाकर चौपाल कार्यक्रम करने की जिम्मेदारी मिली थी। सरकारी मशीनरी इस काम को भी पूरा नहीं कर सकी। अफसर दफ्तरों से ही बाहर नहीं निकले। नतीजा, न तो चौपाल लग रहीं हैं और न विकास कार्यो का सोशल आडिट ही हो पा रहा है।


विकास योजनाओं के लिए सभी जिलों में करोड़ों रुपये भेजे जाने के बाद भी शासन की समग्र विकास की मंशा पूरी होती नहीं दिखाई दे रही है। लगातार गड़बड़ी और अनियमितताएं सामने आ रही हैं। इसे रोकने के लिए अफसरों को गांव-गांव जाकर सोशल आडिट करने को कहा गया था। प्रमुख सचिव रोहित नंदन ने सभी जिलाधिकारियों को इस संबंध में कड़े निर्देश जारी किए थे।


इसमें जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी और सभी उप जिलाधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई थी। इन सभी अफसरों को अनिवार्य रूप से ग्रामों का दौरा करने और ग्रामीणों को को एक जगह बुलाकर उनके साथ चौपाल करनी थीं। ऐसा इसलिए किया गया था ताकि ग्रामीण विकास कार्यो पर अफसरों के सामने खुलकर चर्चा करें। यदि कोई गड़बड़ी हो तो भी वह भी सामने आ सके। अफसरों को ग्रामीणों की मौजूदगी में विकास कार्यो का सोशल आडिट करना था और उसकी रिपोर्टिग शासन को करनी थी, मगर ऐसा होता कहीं नहीं दिखाई दे रहा। अफसरों को ग्रामों का दौरा करने की ही फुर्सत नहीं मिल रही, वह चौपाल लगाकर सोशल आडिट कैसे करेंगे। गाजियाबाद जिलें तो फिलहाल यही कहानी दोहराई जा रही है। कागजों में भले कितने ही घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं।

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