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शिक्षा के अधिकार से आगे की राह

राज्यसभा ने हाल में बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के अधिकार का बिल पास कर दिया है। वह जल्दी ही लोकसभा में पास होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी से कानून बन जाएगा। यह विधेयक मूलत: सन  2005 के शिक्षा के अधिकार विधेयक का संशोधित रूप है और यह सन 2002 में हुए 86वें संविधान संशोधन को लागू करता है। 86वां संविधान संशोधन चाहता है कि राज्य सभी बच्चों को पास के विद्यालय में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दे। जब तक बच्चा प्राथमिक शिक्षा न पूरा कर ले, उसे न तो किसी कक्षा में रोका जाएगा, न ही बाहर निकाला जाएगा और न ही बोर्ड परीक्षा में बैठने के लिए बाध्य किया जाएगा। स्कूलों को यह भी हक नहीं होगा कि वे आवेदक का दाखिले के समय किसी तरह का टेस्ट लें या उससे कोई अनुदान लें। जो भी बच्च प्राथमिक शिक्षा पूरा करेगा उसे एक प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। यह भी प्रावधान है कि केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूल और बिना अनुदान वाले स्कूलों को समाज के वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के कम से कम 25 प्रतिशत छात्रों को दाखिला देना होगा। किसी व्यक्ति को अगर कोई शिकायत है तो वह स्थानीय अधिकारी को अपनी बात लिख कर दे सकता है। इस अपील पर निर्णय या तो बाल अधिकारों की रक्षा के लिए बना राज्य आयोग करेगा या फिर निर्दिष्ट अधिकारी।

शिक्षा के अधिकार का विधेयक एक बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक कानून है। समय के साथ यह विधेयक समाज में महत्वपूर्ण बदलाव करने की सामर्थ्य रखता है। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति जो भारत के भविष्य के बारे में सोचता है, वह लंबे समय से प्रतीक्षित इस पहल का समर्थन ही करेगा। फिर भी मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक में कई खामियां हैं। पहले और अहम् मुद्दा वित्त का है। इस पहल का खर्च केंद्र और राज्य दोनों किस तरह उठाएंगे, इस बारे में बिल मौन है। वास्तव में न तो केंद्र और न ही राज्य इस बात से वाकिफ हैं कि इस बिल से किस तरह का आर्थिक बोझ उनके कंधों पर आने वाला है। इस बारे में जब तक कोई संशोधित फॉर्मूला तैयार नहीं होता तब तक 65-35 वाले फॉर्मूले को ही मान कर चलना चाहिए। वास्तव में राज्य तो यह मांग कर रहे हैं कि 75-25 की हिस्सेदारी वाले फॉर्मूले पर वापस चले जाना चाहिए। जो भी हो इन भारी वित्तीय जिम्मेदारियों की उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि इनके बारे में अनुमान भिन्न-भिन्न हैं। अतिरिक्त फंडिग की जरूरत के अनुमान इस प्रकार हैं। 1997 में 83वें संशोधन बिल के मसौदे में यह अनुमान पांच साल के लिए 40,000 करोड़ रुपए का बताया गया था। इसी तरह 1999 में बनी तापस मजूमदार कमेटी ने दस साल में इस काम को पूरा करने के लिए इसका अनुमान 1,36,922 करोड़ रुपए तक रखा था। 2001 में जो 93वां संशोधन विधेयक आया उसमें दस साल के खर्च का अनुमान 98,000 करोड़ रुपए था। जबकि 2005 में सीएबीई कमेटी ने छह साल के लिए 3,21,000 से 4,36,000 करोड़ रुपए का अनुमान दिया था। इसलिए वित्त की उपलब्धता और केंद्र और राज्य के बीच उसका वितरण और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को सावधानीपूर्वक निर्धारित किया जाना चाहिए। वित्तीय चुनौती के अलावा दूसरी चिंता शिक्षा के नतीजे को लेकर है। यह विधेयक स्कूली शिक्षा और उसके भौतिक ढांचे के अधिकार की गारंटी तो लेता है, लेकिन उसके नतीजे की गारंटी नहीं लेता। विधेयक में कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक यानी आठवीं कक्षा तक किसी भी छात्र को कहीं बीच में रोका नहीं जाएगा। लेकिन इसमें नतीजों का कोई ख्याल नहीं है। हाल में कुछ राज्यों में कक्षा छह के छात्रों के नंबरों के औसत प्रतिशत के बारे में एनसीआरटी की रपट ने चौंकाने वाली तस्वीर प्रदर्शित की है। रपट के अनुसार आठवीं तक पहुंच चुके छात्र भी भाषा और गणित में बहुत खराब प्रदर्शन करते हैं। दूसरी तरफ विधेयक अभिभावकों को भी यह हक नहीं देता कि वे अपने बच्चे को स्वेच्छा से किसी कक्षा में रोक सकें। इस मामले में दुनिया भर के देशों में एक अलग किस्म का चलन है। उदाहरण के लिए अमेरिका में स्कूलों के लिए  कानून है ‘कोई बच्च पीछे न छूट जाए’ (नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड)।
इसके अनुसार कक्षा तीन और आठ के लिए पढ़ने और गणित के सवाल करने का एक स्वतंत्र आकलन करने का प्रावधान है। अगर स्कूल आरंभिक ट्यूशन, स्कूल के पुनर्गठन और शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से न्यूनतम स्कोर हासिल करने में नाकाम रहा तो उसके लिए दंड का विधान है। इसलिए ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमने सौ फीसदी हाजिरी तो हासिल कर ली पर शिक्षा और शिक्षण की गुणवत्ता घटिया रही।

तीसरी बात निजी स्कूलों के बारे में है। यह विधेयक केंद्रीय और प्राइवेट स्कूलों से वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है। सिद्धांत के रूप में कमजोर और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की नीति वांछनीय है। पर इसका खाका इस तरह से बनना चाहिए कि इससे निजी निवेश में बाधा न उत्पन्न हो। आरक्षित बच्चों के लिए जो भुगतान का नियम है, उसका प्रति छात्र औसत उतना ही है, जितना सरकारी स्कूलों में होता है। अगर योजना आयोग की तरफ से सुझाया गया भुगतान का फॉर्मूला नहीं अपनाया गया तो बाकी 75 प्रतिशत छात्रों पर असह्य भार पड़ेगा। इससे स्कूलों में निजी निवेश पंगु हो जाएगा। स्कूलों के लिए सरकारी और निजी दोनों तरह के निवेश जरूरी हैं। स्कूलों के मानक के बारे में यहां पलड़ा सरकारी स्कूलों की तरफ झुका हुआ है। धारा 18 और 25 के तहत शिक्षक और छात्र के अनुपात का कोई नियम नहीं है, जबकि इस बारे में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच एक समान धरातल का नियम बनना चाहिए। धारा 26 के तहत व्यवस्था है कि खाली पदों की संख्या स्कूल के लिए मंजूर स्टाफ की संख्या के दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है।

जैसा कि प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक चैम्फोर्ट ने कहा है कि शिक्षा का मतलब नैतिकता और समझदारी से है। नैतिकता गुण की सहायता के लिए है और समझदारी दूसरों के दुगरुण से बचाने के लिए है। शिक्षा को नैतिकता की तरफ ज्यादा झुका देंगे तो शहीद पैदा होंगे औरसमझदारी की तरफ ज्यादा झुका देंगे तो अहम वाले साजिशकर्ता पैदा होंगे। यह विधेयक अपने मौजूदा स्वरूप में नैतिकता और समझदारी में संतुलन कायम करता है, इसमें संदेह है। 

nandu@nksingh.com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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