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स्त्री विमर्श: बिन बदले नाम के मायने

पता नहीं दुनिया के किसी कोने में पुरुष द्वारा शादी के बाद अपनी पत्नी का नाम या सरनेम अपनाया जाता है या नहीं, लेकिन महिलाओं के लिए यह आम चलन है। यह प्रश्न नए सिरे से विचारणीय हो उठा है, जबसे ब्रिटेन के मशहूर टैबलॉयड अख़बार ‘सन’ की सम्पादक तथा जल्द ही एक अन्तरराष्ट्रीय मीडिया कम्पनी की चीफ एक्जिक्युटिव होने वाली रेबेका वाड ने अपनी शादी के बाद अपने पति का सरनेम अपनाने का फैसला किया है। मालूम हो कि पिछले दिनों रेबेका ने अपनी (दूसरी) शादी की और वह रेबेका ब्रुक्स बन गयीं। उनके पति का नाम चार्ल्स ब्रुक्स है। उन्होंने अपने ई-मेल के जरिए लोगों को अपने बदले नाम की सूचना भी दी और सम्बधित लोगों के लिए अपने मैरेज सर्टिफिकेट की कॉपी भी भेज दी।

रेबेका की शख्सियत का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह ‘सन’ जैसे बहुचर्चित टैबलॉयड की सम्पादक हैं तथा यूरोप के तमाम राजनेताओं, प्रधानमंत्रियों से उनके नजदीकी रिश्ते हैं। उनके बारे में कहा जाता रहा है कि वह लंच किसी प्रधानमंत्री के साथ करती हैं तो डिनर के लिए दूसरे देश के प्रधानमंत्री के यहां जाती हैं। इतना ही नहीं नारी अस्मिता के बारे में अपने अलग विचारों के लिए भी वह जानी जाती थीं। यह अकारण नहीं कि अपनी पहली शादी के बाद उन्होंने अपने पति का नाम न लेकर अपना पूर्वनाम ही बनाए रखा था। रेबेका का यह छोटा सा दिखनेवाला कदम उन तमाम महिलाओं के संघर्षों और बलिदानों को धूमिल करता है, जिन्होंने स्त्री की स्वतंत्रता के लिए बहुत जोखिम उठाया है। 1850 के दशक में शुरू हुए स्त्रियों के मताधिकार आन्दोलन की प्रणोता रही ल्यूसी स्टोन ने उस समय महिलाओं से अपील की थी कि महिलाएं शादी के बाद अपने पुराने नाम बनाये रखें। ये छोटी-छोटी लगने वाली बातें आन्दोलन के एजेंडे पर यूं ही नहीं आयी हैं, बल्कि इसका रिश्ता औरत के लिए बनाये जानेवाले उसके स्वतंत्र पहचान तथा अस्तित्व से जुड़ा होता है। किसी भी तबके के दोयम दर्जे की स्थिति ढेरों छोटी-छोटी चीजों को मिला कर बनती हैं, जो धीरे-धीरे सोच, परम्परा, संस्कृति का हिस्सा बन जाती है। हमारे देश में भी अस्सी के दशक में उभरे नारी आन्दोलन ने औरत की सामाजिक स्थिति को बदलने के लिए जबरदस्त संघर्ष किया। इसके तहत औरत की स्थिति में बदलाव के लिए ढेरों परम्पराओं को भी चुनौती दी गई। लेकिन यह देखने को मिलता है कि जिन महिलाओं ने यह लड़ाइयां लड़ीं, नसिर्फ अपने जीवन में अपना स्वतंत्र अस्तित्व और पहचान बनाई, बल्कि पूरी औरत जमात को यह सन्देश दिया कि वे भी अपने जीवन में न्याय और बराबरी के लिए प्रयास करें, उन्हीं की अपनी सन्तानें या नई पीढ़ी की युवा लड़कियां उसी परम्परावादी जीवन शैली को अपनाने से परहेज नहीं रखती हैं। नारी आन्दोलन में लम्बे समय से सक्रिय एक मित्र की बेटी ने बिना किसी संकोच गृहिणी बनने की इच्छा जाहिर की। आजकल इस तरह के किसी भी मामले को आसानी से च्वॉइस यानी अपनी इच्छानुसार चुनाव का मामला बना दिया जाता है।
इसे नयी पीढ़ी का स्मृतिलोप कहें या अन्य कोई बात, लेकिन इस पीढ़ी को शायद यह एहसास नहीं दिखता कि औरत ने सार्वजनिक दायरे में आने के लिए दशकों संघर्ष किया है। बाहर की दुनिया में जगह बनाने के लिए न तो परिवार तैयार था, न ही समाज और न ही सरकारों ने अपनी नीतियों में ऐसी पहल बढ़-चढ़ कर की, जिससे औरत को बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहन मिले।


सरकारों ने तो तभी कुछ दिया जब महिलाओं ने उन पर दबाव बनाया। परिवार के अन्दर कमाने वाली सदस्य की हैसियत हासिल करना तथा साथ में समाज में भी यह सन्देश देना कि वह हर काम करने में सक्षम है। बिना बराबर के योगदान के बराबर की हैसियत किसी को नहीं मिलती। यद्यपि घर के अन्दर का काम उन्हीं के हिस्से होता था, और बिन पैसेवाले कामों का मूल्य हम सिर्फ अपनी चाहत से नहीं बढ़ा सकते, बल्कि इसके लिए अन्दर और बाहर दोनों कामों का स्त्री-पुरुष के बीच बंटवारा करना होगा। इसीलिए महिलाओं ने, जब तक स्थिति नहीं बदलती तब तक दोहरा बोझ उठाना स्वीकार किया। लेकिन आज की पीढ़ी जिसे तुलनात्मक रूप से आसानी से पढ़ना-लिखना तथा  खुद को विकसित करने का अवसर मिल पाया है, वह अपने परिश्रम तथा व्यवहार से अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए तत्पर नज़र नहीं आ रही है। यदि सब सामान्य हो गया होता, औरत अपने हालात में संकटों की दहलीज पार कर गयी होती, यानि समाज स्त्रीद्रोही नहीं होता और समानता कायम हो चुकी होती तो पीछे जाना शायद उतना चिन्तनीय नहीं होता।              
                                                              
अंजलि सिन्हा
subhanjali@redifmail.com
लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से जुड़ी हैं

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