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‘जिबरिश’ से शांति

मन की अशांति ग्लोबल और कालातीत समस्या है। उपाय जब तक मन की फितरत के अनुकूल न हों, फलदायक नहीं हो सकता। शांति चाहिए तो समझना होगा कि आखिर मन है क्या? यह एक विशाल शून्य है जहां स्मृतियां, आशाएं, इच्छाएं, विचार, कल्पनाएं, कुंठाएं आदिविचरित करती रहती हैं। इन्हें घूर्णन और परिभ्रमण से रोकना संभव नहीं हो पाता और इसलिए मन की शांति असंभव जान पड़ती है। इसे संभव करने का एक सरलतम रूप है- ‘जिबरिश’। ‘जिबरिश’ का अर्थ है- अर्थहीन बकवास करना। ओशो कहते हैं कि यह अर्थहीन बकवास ही आंतरिक बकवास को रोकती है। ‘जिबरिश’ के जरिये मन को उसकी अर्थहीन जानकारियों, सूचनाओं, स्मृतियों आदि से खाली किया जाता है। इससे मन का कूड़ा-करकट बाहर जाता है।

इस कला की खोज करीब दस शताब्दी पहले सूफी संत अल जब्बार ने की। जब्बार की यह भाषा ही जिबरिश कहलाई। उस सूफी संत ने जीवन भर जिबरिश में ही बात की। लोग उससे पूछते ‘सत्य क्या है?’ या फिर ‘ईश्वर की रचना किसने की?’ और जब्बार एकदम से अर्थहीन बोली बोलने लगते। पूछने वाला उनकी ऊर्जा की बौछार से स्तब्ध रह जाता। जब्बार के बाद भी कई सूफियों ने इस विधि को आजमाया।बीसवीं सदी में ओशो ने इसे फिर से प्रतिष्ठित किया और इसे ध्यान की ऊंची प्रतिष्ठा दी। आज सूचनाओं का युग है। मनुष्य की बुद्घिजीविता बढ़ी है और ऐसे में जिबरिश की प्रासंगिकता और बढ़ गई है।

जिनका भी मन कोलाहल से भरा हो, जिबरिश को आजमा सकते हैं। इसके लिए एकांत में बैठें और फिर अर्थहीन बकवास शुरू कर दें। वैसा ही जैसे बच्चे करते हैं। इस दौरान कल्पना करें कि आप मन से सारी थकान, सारे तनाव ठोस चीजों की तरह बाहर फेंक रहे हैं। कुछ ही देर बाद मन असीम शांति से भरा पाएंगे। आप अपने मन के सारे गुबार जिबरिश में व्यक्त कर सकते हैं। इससे आप ऐसा व्यवहार नहीं करेंगे जो क्लेश कलह का कारण हो। व्यर्थ के तर्क-कुतर्क से भी आप बचेंगे। तो आइये जिबरिश करें।

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