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शहीदों के लिए स्मारक क्यों नहीं?

कारगिल विजय दिवस पर शहीदों को एक दिन सेल्यूट कर हमने अपनी देशभक्ति का परिचय दे दिया। जरा सोचिए क्या हम अपने सुरक्षा तंत्र की जानबूझकर चूक करके शहीद करवा दिए गए नौजवानों की शहादत को कम नहीं कर रहे हैं? कारगिल प्रकरण से रक्षा मंत्रालय ने शायद कोई सबक नहीं सीखा सिर्फ एक कमेटी गठित कर दी गई और कमेटी की अधिकतर मुख्य सिफारिशें सिर्फ फाइलों में दफन कर दी गई हैं। देश की सुरक्षा में शहीद उन वीर जवानों की याद में कोई भी शहीद स्मारक नहीं बनाया गया, जो आज के नौजवानों में देश के प्रतिदेशभक्ति का जज्बा पैदा कर सके। राजनेताओं के स्मारक बनवाने के लिए लोग तोड़फोड़ पर उतर आते हैं। शहीदों का एक स्मारक बनाना उन्हें याद नहीं आता।

मनोज शर्मा, श्रीनिवासपुरी, नई दिल्ली

जनकल्याण की सोचे सरकार
पंकज चतुर्वेदी का लेख ‘गुमनाम शहादत और सरकारी उदासीनता’ पढ़ा। आपके माध्यम से जहां मैं उनकी संवेदनशीलता, जनकल्याण की भावना और सरकार को सुझाव के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद देता हूं, वहीं मेरी आपसे प्रार्थना है कि भारत सरकार को विशेष पत्र लिखकर उन्हें उक्त लेख के एक-एक शब्द से अवगत कराएं कि वे लेख में प्रस्तावित ‘संवेदनशील विभाग’ (महकमा) अवश्य खोलें जिससे अपारजनकल्याण हो सके। कोई भी सरकार उस देश के जनकल्याण और विकास के लिए ही बनती है, अत: यह उनका उत्तरदायित्व भी है।

कमलधर दास, खेराजपुर, दरभंगा

तैनू की प्रॉब्लम
ब्रिटेन की सिविल सर्विस यूनियन ने ब्रिटिश काउंसिल की वित्त और आईटी से जुड़ी एक सौ से अधिक नौकरियों को भारत से आउटसोर्स किए जाने की योजना का विरोध किया है। उनको भय है कि यह सरकारी विभागों में भी एक उदाहरण बन सकता है। अरे! अंग्रेजो आपने भी तो हमारे देश पर दो सौ साल राज किया था तब किसी भारतीय यूनियन ने आप के शासन का विरोध किया था? साथ ही आप हमारी संस्कृति, समाज, सभ्यता, भाषा में सेंध लगा गए हमने तो उफ तक नहीं की, तो फिर आप को क्या प्रॉब्लम है?

राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

श्रीधरन से सीख लें
बूटा सिंह के बेटे पर एक करोड़ रुपए की रिश्वत लेने का आरोप लगा है। अभी कुछ दिन पहले दिल्ली मेट्रो के निर्माण स्थल पर हुए हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए ई. श्रीधरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। साथ ही उन्होंने पूरे निर्माण कार्य की जांच भी शुरू करवा दी। वहींदूसरी तरफ बूटा सिंह अपने बचाव में तरह-तरह के तर्क लेकर आ रहे हैं। इससे उनकी छवि में इजाफा होने की बजाय कमी ही हो रही है। आरोप लगने के तत्काल बाद अगर वे इस्तीफा दे देते तो लोगों में उनके प्रति विश्वास ही बढ़ता।

मुकेश शर्मा, चंडीगढ़

वर्दी की साख पर बट्टा
उत्तर प्रदेश के चंदौली में सेना की भर्ती के दौरान हुई भगदड़ व फायरिंग में एक युवक की मौत से राज्य सरकार व सेना दोनों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होना स्वाभाविक है। अपने चहेतों के चक्कर में सेना के अधिकारियों व जवानों ने ऐसी घिनौनी हरकत को अंजाम दिया।रक्षा मंत्रालय को इस कांड में शामिल जवानों के खिलाफ कोर्ट मार्शल करना चाहिए। पुलिस को भी जिम्मेदार माना जायेगा जो भीड़ को नियंत्रित नहीं कर सकी व पांच घंटे तक चले उपद्रव को रोक नहीं सकी।

चन्द्रशेखर पैन्यूली, लिखवार गांव, टिहरी

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