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अब आ रहे हैं इंसान के बनाए जानवर

पेड़-पौधों की कलम रोपने और बायोटेक्नोलॉजी के सहारे फसलों की संकर किस्में उपजने का काम कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। कुछ इसी तरह की तकनीक अपनाकर मानव ने पहले पशुओं की क्लोनिंग की और बाद में इसे खुद पर आजमाया। कौन जानता था कि पशुओं की ठीक उसी तरह कलमें तैयार होने लगेंगी, जैसे खेतों -क्यारियों में गुलाब की कलम में अंकुर फूटते थे। क्लोनिंग के जरिए विकसित की जा रही जानवरों की नई नस्लों के बारे में जानकारी दे रहे हैं अनुराग मिश्र

भारत तेजी से क्लोनिंग युग में प्रवेश कर रहा है। हालांकि भारत ने क्लोनिंग विज्ञान में शुरुआत देर से की, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे मुल्क इस विज्ञान में पहले ही तरक्की कर चुके हैं। हाल में भारत ने क्लोनिंग के क्षेत्र में मुस्तैदी दिखाई है और कई सफलताएं अर्जित की हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने भैंस की क्लोनिंग करने और ट्रांसजेनिक रोहूफिश बनाने में सफलता हासिल की है। वैज्ञानिक क्लोन पशमीना बकरी, अन्य दुधारू जानवर और खरगोश बनाने में लगे हुए हैं।

क्लोन भैंस
कुछ महीनों पहले बनाई गई क्लोन भैंस गरिमा जिसको नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीटच्यूट (एनडीआरआई) करनाल में पेश किया गया। गरिमा पहली क्लोन भैंस से अलग है। उस समय दाता कोशिकाओं को भ्रूण द्वारा लिया गया था। पहली स्थिति में दाता कोशिकाओं को हालिया पैदा हुए बछड़े के कान से लिया गया था।

दूसरे शब्दों में कहें, तो गरिमा का क्लोन ऐसे भ्रूण से बनाया गया है जो रोशनी में नहीं दिखता। एनडीआरआई के वज्ञानिक इससे पूरी तरह वाकिफ हैं कि क्लोनिंग आसान काम नहीं है और क्लोनिंग की दूसरी कोशिश में उन्होंने अपना होमवर्क पूरी तरह से किया है। उन्होंने नई और एडवांस्ड ‘हैंड गाइड क्लोनिंग तकनीक’ का इस्तेमाल किया है, जो परंपरागत क्लोनिंग तकनीक का एडवांस रूप है।

क्लोनिंग की नई तकनीक
हैंड गाइड क्लोनिंग तकनीक में ‘एग-सेल’ को व्रिटो में डाला गया और अच्छे ब्लेड से इसका ट्रीटमेंट किया गया। बाद की अवस्था में इन कोशिकाओं को डोनर मैटेरियल से फ्यूज किया गया। इन्हें प्रयोगशाला में विकसित किया गया और ग्राहक भैंस पर इसको ट्रांसफर कर दिया गया। परिणामस्वरूप जन्म के समय पैदा होने वाली भेड़ का वजन 43 किग्रा था। ‘हैंड गाइड क्लोनिंग तकनीक’ के प्रति वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक और दुधारू जानवर उत्पन्न करने में ज्यादा सहायक सिद्ध होगी। उनका कहना है कि यह तकनीक नए युग की शुरुआत करेगी।

आंकड़ों की जुबानी
भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक मुल्क है। यह प्रतिवर्ष 104.9 मिलियन टन दूध का उत्पादन करता है। भारत में दूध उत्पादन में 4 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ोतरी हो रही है और मौजूदा दौर में पूरी दुनिया के दूध उत्पादन का 15 प्रतिशत भारत में ही होता है। गौर करने वाली बात है कि इसमें से 55 प्रतिशत दूध का उत्पादन भैंस से होता है। हालांकि साथ ही बढ़ती आबादी की वजह से दूध की मांग और व्यक्तिगत आय में लगातार इजाफा हो रहा है। पूरी दुनिया में भारत में मवेशियों और भैंसों की संख्या सबसे ज्यादा है। यह जनसंख्या क्रमश: 18 करोड़ और 8.5 करोड़ है। भारत में घरेलू जनवरों के लिए 30 प्रतिशत चारे की कमी है।

भारत में क्लोनिंग की जरूरत
इयान विल्मट के 1997 में डॉली भेड़ बनाने के पश्चिम में जनवरों की क्लोनिंग नीतिगत मुद्दों और वज्ञानिक दोनों कारणों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी। भारत में शोधकर्ताओं का मकसद पूरी तरह स्पष्ट है। डेरी और फिश प्रोडक्शन बढ़ाने के लिहाज से भारत में नई नस्लों को बनाने पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही इसकी सहायता से विलुप्त हो चुके जानवरों को भी बचाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भैंस और मवेशी की क्लोनिंग करने से उच्चकोटि की नस्ल उत्पन्न की जा सकेगी और वह भी बिना किसी पेरेंट गुण की हानि के। क्लोनिंग का सबसे बड़ा फायदा डेयरी सेक्टर को होगा। इसकी मदद से और तेजी से नस्लें बनाई जा सकेगी।

क्या होती है क्लोनिंग
क्लोनिंग एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है जिसमें किसी भी व्यक्ति की प्रतिकृति तैयार कर सकना संभव होगा। बायोटेक्नोलॉजी में क्लोनिंग डीएनए फ्रेगमेंट, कोशिका और ऑर्गेनिज्म द्वारा प्रतिकृति तैयार करने का तरीका है। क्लोन को ग्रीक भाषा के शब्द ट्विग, शाखा से बनाया गया है। सामान्यत: क्लोनिंग तीन तरीकों से की जाती है। मॉलीक्युलर क्लोनिंग, सेल्युलर और स्टेम सेल रिसर्च क्लोनिंग। आज के दौर में सबसे ज्यादा प्रचलित स्टेम सेल अनुसंधान है। मॉलीक्युलर क्लोनिंग में एक परिभाषित डीएनए क्रम की कई प्रतिकृतियां तैयार की जाती हैं।

फिल्मों में क्लोनिंग
वर्ष 1978 में एक फिल्म बनी थी ‘स्लीपर’ और दूसरी ‘दि बॉयज फ्रॉम ब्राजील’। स्लीपर में तानाशाह को जब क्रांतिकारी बम से उड़ा देते हैं। उसके चमचे उसकी नाक की कोशिकाओं से पूरा तानाशाह फिर से बना डालते हैं। इसी तरह दि बॉयज फ्रॉम ब्राजील में हिटलर के रक्त से उसके क्लोन तैयार किए गए थे जो अभी बाल अवस्था में ही होते हैं। 1993 में आई फिल्म जुरासिक पार्क में 6 करोड़ वर्ष पहले विलुप्त हुए डाइनासोर की प्रतिकृति तैयार किए जाते हैं।

क्लोनिंग की शुरुआत
पेड़-पौधों की कलम रोपने और जवप्रौद्योगिकी के सहारे फसलों की संकर किस्में उपजने का काम कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। 1997 में इयान विल्मट और उनके वैज्ञानिकों ने अथक परिणाम करके क्लोन भेड़ डॉली का निर्माण करने में सफलता पाई। जिस तकनीक का सहारा लेकर उन्होंने यह चमत्कार किया, उसकी पहल 1975 में गर्डन नामक वैज्ञानिक ने की थी। उन्होंने न्यूक्लियर ट्रांसफर नामक तकनीक का आविष्कार किया था।

इस तकनीक के दो चरण थे। पहले चरण में उन्होंने मेढक के डिंब से उसके नाभिक को अलग किया और दूसरे चरण में एक अन्य मेढक की कोशिका को नाभिकविहीन डिंब में प्रत्यारोपित किया। यही वह न्यूक्लियर ट्रांसफर तकनीक थी, जिसमें एक कोशिका के नाभिक की दूसरी कोशिका के नाभिक से अदला-बदली की जाती है और इस तरह एक नई कोशिका को जन्म दिया जाता है, जिसका नाभिक बिलकुल भिन्न कहा जा सकता है।
गर्डन का यह प्रयोग मेढ़कों पर सफल रहा था, लेकिन टैडपोल्स पर उनका यह प्रयोग कारगर साबित नहीं हुआ। विल्मट के सहयोगी कीथ कैंपबेल ने उनके साथ मिलकर सेल साइकिल तकनीक का समावेश कर न्यूक्लियर ट्रांसफर तकनीक से जुड़ी यह बाधा दूर कर ली। कीथ और विल्मट ने गर्डन की तकनीक को ही सेल साइक्लिंग के जरिए भेड़ उत्पन्न करने में इस्तेमाल किया था। इस पूरी टीम को क्लोन भेड़ डॉली उत्पन्न करने के लिए 276 असफल प्रयासों का सामना करना पड़ा। तकरीबन 148 दिनों के गर्भकाल के बाद 24 फरवरी, 1997 को डॉली भेड़ का जन्म हुआ।


कुदरती क्लोनिंग 
पेड़ों के समूह या मशरूम के रिंग वास्तविकता में ‘क्लोनल कॉलोनी’ होते हैं। यह जेनेटिक रूप से समान ट्विंस का समूह होते हैं जिनकी बुनियाद एक ऑर्गेनिज्म होती है या यूं कहें कि इनकी उत्पत्ति एक ऑर्गेनिज्म से होती है।

क्लोनल कॉलोनी पौधों के समूह, फंगस और माइक्रोब्स एक फाउंडर से बिना क्रांसिग किए उत्पन्न होते हैं और जेनेटिक रूप से समान होते हैं।

कोर्कस के पौधे अंडरग्राउंड एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं और सभी ट्विंस होते हैं।

मशरूम एक फ्रूटिंग बॉडी होती है जो कि एक असली मशरूम की पुनरूत्पादित संरचना होती है। भूमिगत स्ट्रेंड माइसिलियम तेजी से क्लोन होता है।

सबसे बड़ी कॉलोनी 106 एकड़ (43 हेक्टेयर)  की है जिसमें 47,000 एस्पेन पेड़ों का समूह है। यह कॉलोनी अमेरिका के साल्ट लेक सिटी, यूटा में है।

प्रजतियां जो क्लोन बनाने में सक्षम हैं
पेड़ों की लकड़ी, पौधों की आइवी विस्टीरिया, ब्लूबेरी, पोजीडोनिया फंगी, मशरूम, केले की जड़े तेजी से फैलती हैं और नए जेनेटिक तौर से समानरूपी पौधे बनाती हैं।

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