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पुनर्जीवित हुआ सवा लाख साल पुराना बैक्टीरिया

ग्रीनलैण्ड की बर्फ की परत में 3 किलोमीटर की गहराई में 1,20,000 सालों से दफन एक बैक्टीरिया को वापिस जीवित करने में सफलता मिली है। वैज्ञानिकों का विचार है कि हो सकता है कि भविष्य में अन्य ग्रहों के बर्फ में मिलने वाले बैक्टीरिया इसके समान निकलें। यह बैक्टीरिया छड़ आकार का है यानी बैसिलस समूह का और इसकी लंबाई-चौड़ाई क्रमश: 0.5 माइक्रोमीटर और 0.3 माइक्रोमीटर है। अर्थात यह वर्तमान में पाए जाने वाले आम बैक्टीरिया एशरीशिया कोली से करीब 50 गुना छोटा है।

क्या है खासियत  
इस नई बैक्टीरिया प्रजति हर्मीनिमोनास ग्लेसिआई की खोज करने वाले दल की एक सदस्य पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय की जेनिफर लवलैण्ड-कट्र्ज कहती हैं कि ‘इस बैक्टीरिया की अनोखी बात यह है कि यह छोटा है और कम पोषण पर जिंदा रहता है।’

इसकी खोज का समाचार हाल में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सिस्टेमेटिक एण्ड इवोल्यूशनरी माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। लवलैण्ड-कट्र्ज को लगता है कि अपने छोटे आकार और सतह पर मौजूद कई सारे फ्लेजिला की मदद से यह बैक्टीरिया बर्फ के अंदर उपस्थित बारीक नलियों में घूमकर पोषण की तलाश करता होगा। बर्फ के अंदर धूल, बैक्टीरिया की मृत कोशिकाएं, वनस्पति बीजणु, खनिज लवण और कई अन्य कार्बनिक पदार्थ पाए जाते हैं। यही पदार्थ इसका पोषण रहा होगा।

कैसे हुआ चमत्कार
पेनसिल्वेनिया के दल ने इस बैक्टीरिया को पुनर्जीवित करने के लिए सात महीने तक इसे 2 डिग्री सेल्सियस पर रखा और फिर साढ़े चार महीने तक शून्य डिग्री पर। इसके बाद ही उन्हें जामुनी-गुलाबी बैक्टीरिया कॉलोनियों के दर्शन हुए। लवलैण्ड-कुट्र्ज के मुताबिक ऐसे सूक्ष्मजीव अन्य ग्रहों पर भी बर्फ में विकसित हुए होंगे। मंगल के बर्फीले ध्रुवों और बृहस्पति के उपग्रह यूरोपा पर ऐसी ही परिस्थितियां होती हैं। उनके अनुसार न्यूक्लिक एसिड, अन्य कार्बनिक पदार्थो और कोशिकाओं को सुरक्षित रखने के लिए बर्फ सवरेत्तम माध्यम है। ऐसे पर्यावरण में ऐसे सूक्ष्मजीव मिलने की संभावना होती है।

(स्रोत फीचर)

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