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पानी भी उसकी जिसका लट्ठ भारी

मैं माननीय सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करता हूं कि महान भारत में जहां इंसान पीने का पानी ही न पा सके और एक-एक बूंद पानी के लिए तरसना पड़े व इस तपती गर्मी में बिना नहाए-धोए जीवन रो-रो कर बिताना पड़े तो उससे अच्छा तो यह है कि मुझ जैसे इंसान को फांसी लगवा दी जाए, क्योंकि आज पानी भी वही पा रहा है जिसका लट्ठ भारी है। ऐतिहासिक महरौली के वार्ड नम्बर 5 बंगला चौक में पांच-सात दिन में सिर्फ एक घंटा ही आता है पीने का पानी, जबकि महरौली क्षेत्र के ही अन्य वार्डो में कहीं एक-दो दिन तो कहीं-कहीं हर रोज दिया जाता है।

रोशन लाल बाली,  महरौली, नई दिल्ली

कहां हैं निगम के कर्मचारी?
भाजपा शासित दिल्ली नगर निगम को जब दिल्ली की मुख्यमंत्री ने गैरजिम्मेदार व भ्रष्ट बताते हुए भंग करने की बात कही तो इस बात ने सूबे की राजनीति को झकझोर के रख दिया। शीला के इस कथन पर अमल करते हुए जब जांच पड़ताल की गई तो दिल्ली नगर निगम कीभ्रष्टाचारी का सबसे बड़ा सबूत मिला क्षेत्र से गायब हुए निगम के सफाई कर्मचारियों से। ये सफाई कर्मचारी सिर्फ और सिर्फ अपने निगम क्षेत्र से ही गायब हैं बाकी रजिस्टर में प्रतिदिन इनकी उपस्थिति दर्ज होती है व साथ ही सरकार से मासिक पगार भी लेते हैं। सरकारी आंकड़ों में तो ये मौजूद हैं परंतु कार्यक्षेत्र में इन्हें कभी नहीं देखा जाता है। इसी भ्रष्टाचारी के चलते निगम के कुछ वार्ड तो ऐसे हैं जहां कहने को तो कर्मचारी 200 से लेकर 400 तक हैं परंतु आने वालों में आधे भी नहीं। शायद इसी भ्रष्टाचारी व गैरजिम्मेदारी के चलते आज भी दिल्ली नगर निगम के सदस्यों को अपनी व अपने क्षेत्र से जुड़ी बदहाली का रोना रोते देखा ज सकता है।

अनूप आकाश वर्मा, जमिया , नई दिल्ली

खुल गई पोल
सिर्फ एक अच्छी बारिश से दिल्ली में सरकार की पोल खुल गई। घटिया नालों, सड़कों, गलियों और ट्रैफिक जम पर दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे पर उंगली उठा रहे हैं जबकि हकीकत यह है कि वोट-नोट की घटिया और सड़ियल राजनीति के तहत बेमिसाल मास्टर प्लान की घोर उपेक्षा पर कोई नहीं सोच रहा है। चंडीगढ़ से ही कुछ सीखें।

वेद, नरेला, दिल्ली

अमेरिका का दोहरा चरित्र
चाहे बिल क्लिंटन हो, बुश हो या ओबामा अमेरिका का रवया भारत के प्रति हमेशा सख्त रहा है और पाकिस्तान के प्रति उदारवादी। भारतविश्व में शांतिदूत, विश्वासपात्र एवं विश्व एकता का मॉडल है। भारत में हमेशा प्रेम, सेवा एवं त्याग की पौध तैयार की जती है। वहीं पाकिस्तान के नापाक मंसूबे  दशकों से बदस्तूर जारी हैं। लेकिन न जाने क्यों अमेरिका द्वारा सैन्य, आर्थिक एवं अन्य तरह की सहायता की बढ़ोत्तरी को तीन गुना करके भारत पर पाक से वार्ता के लिए अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालना समझ से परे है। भारत भी न जाने क्यों इतिहास से सबक न लेकर शांतिदूत बनने की नौटंकी कर रहा है तथा आतंकी हमलों के शहीदों की शहादत पर शर्मिदगी से सराबोर कर रहा है।

 अरुण कुमार शर्मा, हरिद्वार

आप आप हैं
आप तो हमारे सर ताज हैं
फिर भी हम से नाराज हैं।
वीरेन कल्याणी, शाहदरा, दिल्ली

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