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पाप के घड़े को दफनाने का सपना

जर्मनी के एक छोटे से कस्बे ब्रेमेन के द्विवार्षिक आयोजन में एक लाख प्रदर्शनकारी जमा थे। जैसे ही सुभाषित पर्यावरण मंत्री सिगमार गैबरील जलवायु सुरक्षित विश्व के लिए ऊर्जा सुरक्षा पर चर्चा करने आए, तमाम लोग खड़े हो गए। जल्दी ही हॉल में नीली तख्तियां चमक उठीं, उन सब पर लिखा था-‘कोयले का इस्तेमाल बंद करो।’ मैंने महसूस किया कि मंत्री महोदय परेशान हो उठे थे। वे भीड़ में अपने को पर्यावरणविद मान कर डट गए। उन्होंने कहा कि उनका देश परमाणु बिजली घरों को बंद कर रहा है इसलिए वे कोयले के बिजली घर कायम करेंगे। पर ये संयंत्र साफ सुथरे होंगे। वे एक नए किस्म की प्रौद्योगिकी लगाएंगे जिसे कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (सीसीएस) कहते हैं। यह प्रौद्योगिकी कार्बन डाइआक्साइड को खींच कर जमीन में दफन कर देगी। इतने से भी बात न बनते देख मंत्री महोदय ने नया दांव फेंका। उनका कहना था कि जर्मनी, चीन और भारत के लिए कोयले के संयंत्र स्थापित करने के वास्ते सीसीएस प्रौद्योगिकी में निवेश करेगा। चूंकि यह देश कोयले के दजर्नों संयंत्र कायम करेंगे इसलिए जर्मनी को उनके लिए कुछ करना होगा। लेकिन मंत्री का यह सेवा भाव भी वहां की भीड़ को प्रभावित नहीं कर सका।

यह मुद्दा आज भी उतना ही गर्म है। नार्वे, जर्मनी , ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और सऊदी अरब जैसे तेल और कोयले पर निर्भर देश सीसीएस प्रौद्योगिकी को जलवायु दुरुस्त रखने के उपकरण के रूप में जबरदस्ती बेच रहे हैं। एक पखवाड़ा पहले ही नार्वे की सरकार ने बर्गेन में स्लीपनर प्लेटफार्म का मौका मुआयना करने के लिए मंत्रियों की एक उच्चस्तरीय कॉन्फ्रेंस आयोजित की थी। स्लीपनर प्लेटफार्म एक छोटा पायलट प्रोजेक्ट है जिसके तहत कार्बन डाइऑक्साइड को समुद्र के खारे पानी में गहरे जमा किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) के अध्यक्ष आर. के. पचौरी ने इस प्रौद्योगिकी को मंजूरी देते हुए कहा था कि भंडारण की लागत कार्बन डाइऑक्साइड को बांधने की लागत के मुकाबले कम है और यह भी आगे चल कर और कम हो जाएगी। उनकी बात से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अध्यक्ष नाबुआ तनाका ने भी सहमति जताई। उनकी एजेंसी का मानना है कि अगर दुनिया को 2050 तक कार्बन डाइ ऑक्साइड का स्तर 450 पीपीएम तक लाना है तो उसे 2030 तक हर साल 30 सीसीएस संयंत्र कायम करने होंगे।

जबरदस्ती बेचने की बात यहां समझ में आती है। क्योंकि यह विचार बहुत मजेदार है। औद्योगिक देश जिन्हें जीवाश्म ईंधन का उत्सजर्न 2020 तक 30 फीसदी  और 2050 तक 80 फीसदी कम करना है वे नए कोयला संयंत्र बनाना जारी रख सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के माध्यम से वे सारे उत्सजर्न को परित्यक्त खदानों ,गैस या तेल के परिक्षेत्रों में या समुद्र की तलहटी में गहराई में जमा कर सकते हैं। पर हमारे पिछवाड़े क्यों जमा करेंगे? अभी तक हर किसी का मानना है कि यह प्रौद्योगिकी ज्यादा से ज्यादा प्रयोग के स्तर पर है। अमेरिका में फ्यूचरजेन की तरफ से बन रहा ‘रीयल बर्ल्ड’ संयंत्र महंगी लागत के कारण पहले ही खारिज किया जा चुका है। जबकि भारी सब्सिडी वाला ब्रिटेन का संयंत्र तैयार होने में काफी समय ले रहा है। स्वीडन की संयंत्र निर्माण कंपनी वाटेनफाल जो जर्मनी के स्वार्ज पंप में पहला छोटा पायलट प्लांट बना रही है वह आधुनिक कोयला संयंत्र से 20 गुना छोटा है। इसकी लागत अभी भी अनिश्चित है, वह कार्बन डायआक्साइड के प्रति टन 50 से 100 अमेरिकी  डालर तक बैठ सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस प्रौद्योगिकी के तहत पहले विद्युत संयंत्र से निकल रही गैस को बांधा जएगा फिर उसे दफन किए जाने की जगह तक लंबी पाइपलाइनों के माध्यम से ले जाया जाएगा। इसके लिए यह भी जरूरी है कि सीसीएस इस्तेमाल करने वाले कोयला संयंत्र 20 से 30 फीसदी ज्यादा कोयला जलाएं। दूसरे शब्दों में अगर कार्बन उत्सजर्न को खत्म करना है तो पहले ज्यादा कोयला खोदा जाए और उसकी ढुलाई की जाए। इस दौरान कार्बन डाइऑक्साइड जैसी घातक गैस ले जा रही पाइप लाइन में रिसाव भी हो सकता है। इसीलिए जर्मनी के किसान अपनी जमीन के भीतर से पाइप लाइन ले जने का विरोध कर रहे हैं। फिर इसके लिए कौन तैयार होगा?

उसके बाद बड़ा सवाल यह है कि अगले सौ साल यानी कार्बन डाइऑक्साइड की आयु तक इस भंडारण से होने वाले रिसाव के लिए जिम्मेदार कौन होगा? जबकि संयंत्र की आयु तो महज 30 साल की होगी। इसलिए संयंत्र के चलने के दौरान और बंद होने के बाद रिसाव के लिए कौन जिम्मेदार होगा? बीमा कंपनियों का कहना है कि जब तक संयंत्र चलेगा तब तक तो वे कुछ जिम्मा ले सकती हैं लेकिन उसके बाद नहीं। अमेरिका में कंपनियों को रिसाव के बाद होने वाले मुकदमों से सुरक्षा देने का प्रयास चल रहा है। जर्मनी का नया कानून कहता है कि कंपनी सीमित अवधि के लिए जिम्मेदार होगी। ऑस्ट्रेलिया सारी जिम्मेदारी सरकार और समुदाय पर डालता है। ऐसी स्थिति में औद्योगिक देश विकासशील देशों को सीसीएस बेचने के लिए इतने बेचैन क्यों हैं? करीब एक साल पहले ब्रिटेन की सरकार ने एक ऐसे कार्यक्रम को प्रायोजित किया था, जिसका मकसद भारत में  कार्बन डाइऑक्साइड का कब्रिस्तान तलाशना था। वे चाहते हैं कि हम एक पायलट प्रोजेक्ट चलाएं। यह प्रौद्योगिकी इतनी महंगी है कि वे इसे अपने पिछवाड़े लगा पाने का खर्च नहीं उठा सकते। इसलिए वे चाहते हैं कि इस प्रयोग का खर्च स्वच्छ विकास प्रक्रिया(सीडीएम) उठाए।

पोजनान में सबसे विवादास्पद मुद्दा सीडीएम में सीसीएस को शामिल किए जने का था। चर्चा के दौरान मैं मौजूद थी। सीसीएस को चाहने वाले देशों में सऊदी अरब, जपान, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ और अमेरिका शामिल थे। जबकि दूसरी तरफ बाकी दुनिया थी। ब्राजील का कहना था कि यह प्रौद्योगिकी तो महत्वपूर्ण है पर इसके बारे में बहुत सारी चीजें अज्ञात हैं। वेनेजुएला का कहना था कि वे रिसाव का जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। वे सौ साल की गारंटी चाहते थे। जमैका की दलील थी कि अगर प्रौद्योगिकी इतनी अच्छी है तो विकसित देशों को इसे अपनाना चाहिए , और फिर जब एक बार इसका जोखिम कम हो जए तो हस्तांतरित करना चाहिए। नार्वे की प्रेरणा से चीन के अधिकारी भी भविष्य की प्रौद्योगिकी को स्पष्ट तौर पर खारिज कर रहे थे। उनकी दलील थी कि इसके बिना पर औद्योगिक देश आज की कार्रवाई को टाल कर विकासशील देशों पर ज्यादा भार नहीं डाल सकते। सरकारें प्रौद्योगिकी की दलाली करने में लगी हैं। हम सब को पाप करने और उसे दफन करने का परम स्वप्न बेचा जा रहा है।

लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड  एनवायरनमेंट की निदेशक हैं

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