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उर्दू मीडिया: जांच से बंधीं उम्मीदें

‘कातिलों को किफर किरदार तक पहुंचाएं, जख्म तो भरते नहीं राहत मगर मिलेगी’। गुजरात हाई कोर्ट के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की दंगे में भूमिका की जांच के आदेश देने के बाद से उर्दू मीडिया उनसे कुछ इसी अंदाज में पेश आ रहा है। इसके आगे उमर अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा और एसेंबली के अंदर-बाहर टीडीपी व नेशनल कॉन्फ्रेंस में जारी नूरा-कुश्ती को भी खास अहमियत नहीं दी जारही। जम्मू-कश्मीर के दो प्रमुख उर्दू अखबारों ने तो अपने ई-संस्करणों को भी अपडेट करना जरूरी नहीं समझ। इसके पाठकों को उमर के इस्तीफे की खबर एक दिन बाद पढ़ने को मिली। बाकी अखबारों ने टीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के सदन में स्पीकर पर माइक उठाने, उमर के इस्तीफे और सदन में सेक्स कांड की सीबीआई जांच रिपोर्ट फाड़े जाने की खबरें तीन दिनों तक सुर्खियों में जरूर दीं। मगर ‘कश्मीरी रगन जोश’ की संज्ञा देकर इसकीं संजीदगी कम कर दी। इसके इतर मोदी उर्दू अखबारों में बने हुए हैं। ‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’, ‘खुदा खर करे’, ‘मोदी के खिलाफ तहकीकात’, ‘इंसाफ के अमल में अहम फतह’..जसे शीर्षक से खूब खबरें व संपादकीय छप रहे हैं।

अखबारों को लगता है कि मोदी गुजरात दंगे में बुरी तरह फंस चुके हैं। इसलिए किसी भी हाल में नहीं चाहते कि एसआईटी उनसे और तब के आला असफरों तथा दंगा भड़काने में अहम किरदार निभाने वाले राजनेताओं से पूछताछ करे। मोदी मंत्रिमंडल के दो साथी माया कोडनानी और जयदीप पटेल पहले ही आरोपों के घेरे में हैं। गुजरात बीजेपी का तर्क है कि एसआईटी को हाई कोर्ट से मोदी सहित जिन 62 लोगों से पूछताछ का अधिकार मिला है। उनके खिलाफ दंगे को लेकर कहीं कोई एफआईआर दर्ज नहीं है। ‘जदीद खबर’ ने ‘फसाद में मोदी के रोल
की जांच’ में लिखा है कि ‘दंगे में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी की बेवा जाकिया जाफरी ने जब शौहर की हत्या और नरोडा पाटिया मामले में मोदी सहित अन्य लोगों के रोल की जांच को लेकर हाईकोर्ट में अर्जी डाली। तभी से मोदी के इशारे पर उसे निरस्त कराने में भाजपा के एक पूर्व एमएलए लग गए ।’‘इंकलाब’ अपने संपादकीय में लिखता है.. ‘पहला मौका है जब कोई सरकारी जांच एजेंसी गुजरात फसाद में मोदी की भूमिका जांचेगी।’ मोदी का नार्को टेस्ट कराने के पूर्व केंद्रीय कपड़ा मंत्री शंकर सिंह वाघेला के बयान को भी उर्दू अखबारों में खासी अहमियत दी गई। इसे पहले पेज पर टॉप बॉक्स में जगह दी गई। ‘हमरा समाज’ का कहना है, गुजरात के दो सीनियर आईपीएस एस. श्री कुमार और राहिल शर्मा की डायरी भी एसआईटी पूछताछ में शामिल करे। ताकि दंगे के दौरान उसमें दर्ज कई राज खुलकर सामने आ सकें। ‘सियासत’ लिखता है कि ‘सुप्रीम कोर्ट की पहल पर शुरू की गई जंच से उम्मीद बंधी है।’

उर्दू अखबारों ने मोदी के बाद इस सप्ताह जिन खबरों को तरजीह दी। उनमें भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का यूपी प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में हिन्दुत्व की वकालत, पटना में सरेआम युवती को नंगा करना, राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद का जमायत इस्लामी हिंद के दफ्तर में मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों से बंद कमरे में गुफ्तगू, मानवाधिकार आयोग का बटला हाऊस एनकाउंटर मामले में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट देना और टीवी रियलिटी शो सच का सामना प्रमुख है। इन पर लगातार संपादकीय छापे गए। एक खबर के मुताबिक, जमायत इस्लामी हिंद के दफ्तर के बंद कमरे में लालू की जामियत अहले हदीस,आल इंडिया मिल्ली काउंसिल,आल इंडिया मशावरात, दारुल उलूम देवबंद के प्रतिनिधियों से रंगनाथ मिश्र कमीशन रिपोर्ट, लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट, सच्चर कमेटी रिपोर्ट, महिला आरक्षण बिल और बटला हाउस एनकाउंटर मसले पर तकरीबन दो घंटे तक चर्चा हुई। एक उर्दू अखबार राजनाथ सिंह और लालू के बारे में लिखता है, अगले एक से डेढ़ साल में कई प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए एक को हिन्दुत्व और दूसरे को मुसलमानों की चिंता सताने लगी है। उर्दू मीडिया को बटला हाउस एनकाउंटर में मानवाधिकार आयोग का दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट देना रास नहीं आया। सवाल खड़े किए गए कि इस मामले में पुलिस ने दो तरह की रिपोर्ट पेश की है। कौन सही और कौन गलत है। यह कैसे पता लगेगा? पुलिस कहती है बटला हाउस में मौजूद आतंकियों के पास ए.के. 47 राइफल थी। फिर इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा को फोर एम.एम. पिस्तौल से किसने और कैसे गोली मारी?मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के खिलाफ आजमगढ़ से दिल्ली तक प्रोटेस्ट रैली निकालने को भी उर्दू अखबारों ने सचित्र छापा। सहाफी जफर आगा ने अपने एक लेख में इसके लिए आयोग की खिंचाई की है।


लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com           

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