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आम का परिणाम

जो आंख से ओझल हो, याद उसी की आती है। जब दशहरी बाजार में अटे थे, आम आदमियों की तरह, तब हमने डॉक्टर की सलाह मानी। उनका सख्त निर्देश है। डायबिटिक आम नहीं खाते हैं। कुदरत का इंसाफ इसी को कहते हैं। आज जब हम खरीद सकते हैं, तो खा नहीं सकते। बचपन में पिता जी ने कहा सिगरेट नहीं पीनी चाहिए। हमने हिदायत अंतर की तराजू पर तौली। अपने जेब खर्च की सीमा का सोचा। एक बार कवि सम्मेलन में मंच के पीछे नीरज जी को बीड़ी का धुआं उड़ाते देखा था। उनके अनुकरण में अपन कवि तो नहीं बन पाए, पर बीड़ी जरूर पीने लगे। हमने सिर्फ शराब पीकर न किसी को देवदास बनते देखा है, न जवाहर जैकेट पहन कर जवाहर लाल।

अपन ने डर के मारे डॉक्टर की सुनी। उसने हमें खौफनाक नतीजों की चेतावनी दी है, मसलन आंख की रोशनी से लेकर, किडनी के टें बोलने तक। अपन बाबा सूरदास की पदवी से बचना चाहते हैं। अपनी रुचि कृष्ण जी की बाल लीला से ज्यादा उनकी रास लीला में है। जब आंख ही दगा दे जएगी तो जीवन का रास तो दूर, संन्यास-लीला तक नहीं बचती है। वह सिद्ध और होंगे जो मन के नयन से सब ताकते हैं। अपन सामान्य इंसान हैं। सिर्फ आंख और उसमें चढ़े चश्में से ही दूर-पास का नजर आता है, जब डॉक्टर किडनी डैमेज की बात करता है तो अपने दिल में बड़े भाई की डाइलेसिस का दर्द घुमड़ता है। खून निकालना और नया भरना बेहद खर्चीला सौदा है। कौन बेवकूफ कहता है कि आम के आम और गुठली के दाम? ऐसों के लिए कहावत होनी चाहिए कि दाम देकर आम खाओ और पास की पूंजी डायलेसिस में गंवाओ।
अपना तो आलम ये है कि खून के एक कतरे से जी सहमता है। अभी हाल का वाकया है। जैसा घर का दस्तूर है, पत्नी और पप्पू हमें दिखा दिखा कर ही आम खाते हैं। वजिर्त वस्तु हमारे सामने खाकर उनके स्वाद का सुख बढ़ता है। उस दिन दोनों आम के क्रिया-कर्म में जुटे थे, हम दो कागजों को पिन से जोड़ने में। जलन, दुचित्ते मन की जनक है। कागज जुड़े और उंगली भी। बैठे ठाले खून-खच्चर हो गया। तब से हम कभी पट्टी-चढ़ी उंगली को देखते हैं, कभी किडनी की सोचते हैं। यह तो आम खाते देखने का ऊपरी परिणाम है, जने खाकर अंदर क्या होगा। हमें आ चुकी है, एक न एक दिन पप्पू और उनकी मां को भी अक्ल आ ही जएगी, इस भयावह असलियत की। हम आम से महरूम हैं तो दूसरे क्यों न हों?

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