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हड़ताल की हवा

मंदी ने दुनिया भर के बहुत से उद्योगों के लिए परेशानी खड़ी की है। उद्योगों को मंदी की मार से उबारने या फिर पूरी तरह बर्बाद होने से बचाने के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के राहत पैकेज दिए गए हैं। पिछले एक साल की आर्थिक कथा राहत पैकेजों की धारावाहिक कहानी है, जिसमें सरकारों ने सांता क्लॉज की भूमिका निभाई है। लेकिन यह शायद पहली बार हुआ है, जब किसी उद्योग ने कहा हो कि हमें राहत दो नहीं तो हड़ताल करेंगे। देश की निजी एयरलाइंस की 18 अगस्त को हड़ताल करने की धमकी कई तरह से चौंकाने वाली है। होटल और पर्यटन उद्योग की तरह ही एयरलाइंस को भी अतिथि सत्कार उद्योग का हिस्सा माना जाता है। ये ऐसे उद्योग हैं, जो हर मुमकिन तरीके से हड़ताल जैसी बाधाओं से दूर रहने की कोशिश करते हैं। इनके कर्मचारियों की हड़ताल को भी हमेशा ही गैर पेशेवर हरकत माना जाता है। इन उद्योगों की हड़ताल इसमें लगी कंपनियों के साथ ही देश की छवि को तो नुकसान पहुंचाती है, उसकी साख को भी कम करती है। शुक्रवार को एयरलाइंस के संगठन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो यहां तक कह दिया गया कि अगर मांगें न मानीं तो अनिश्चितकालीन हड़ताल तक की नौबत आ सकती है। क्या इसका अर्थ यह है कि ये कंपनियां कारोबार बंद करने की हद तक जाने को तैयार हैं?

यह भी सच है कि मंदी के कारण दूसरे उद्योगों को बहुत नुकसान झेलना पड़ा है तो एयरलाइंस उद्योग पर भी कोई कम मार नहीं पड़ी है। इसकी वजह से पर्यटन में तो कमी आई ही है साथ ही औद्योगिक गतिविधियां कम हो जाने के कारण व्यावसायिक कारणों से होने वाला आवागमन भी कम हुआ है। इसके अलावा लागत कटौती के चक्कर में कुछ कंपनियों में हवाई यात्रा के दूसरे विकल्प अपनाने का दबाव भी बना है। अपने यहां एक समस्या यह भी है कि नए बाजार में भारी स्पर्धा के कारण कंपनियों ने अपनी क्षमता काफी ज्यादा बढ़ा ली है, जबकि उस अनुपात में यात्री उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि एयरलाइनों ने ईंधन की कीमत घटाने और करों में कटौती करने जैसी जो मांगें रखी हैं, उससे ये कंपनियां अपने घाटे की थोड़ी भरपाई भले ही कर लें, लेकिन इस समस्या का कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं दिखाई देता। असल समाधान तो देश में हवाई यात्रा के चलन को बढ़ाना है जिसके लिए इन एयरलाइंस को सरकार के साथ मिलकर एक दीर्घकालिक नीति बनानी होगी, यह काम हड़ताल के बूते करना असंभव है।

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