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धर्मस्थलों की जमीन

अगर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले को सरकारी विभाग ठीक से लागू करें तो हमें धार्मिक स्थलों के नाम पर जमीन पर कब्जे से मुक्ति मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक जमीन पर बने मौजूदा धर्मस्थलों को हटाना तो मुश्किल है लेकिन सरकार को चाहिए कि वह भविष्य में सख्ती से धर्म के नाम पर अतिक्रमण को रोके। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अर्थ यह भी नहीं है कि मौजूदा धर्मस्थलों को नहीं हटाया जाना चाहिए, उसका अर्थ सिर्फ यह है कि उसमें आने वाली दिक्कतों को देखते हुए ऐसा कोई नियम नहीं बनाया जा सकता। हमारे समाज में धर्म एक ऐसा मामला है, जिसमें किसी नियम-कानून का पालन करने की जरूरत नहीं समझी जाती, हालांकि किसी भी धर्म में ऐसा लिखा नहीं है कि नियम कानूनों का पालन न करें। किसी धर्म में ऐसा भी नहीं लिखा है कि धर्म का आचरण तभी माना जएगा जबकि उसे जोर-जोर से प्रचारित किया जएगा, लेकिन धार्मिक स्थलों या कार्यक्रमों में लाउडस्पीकरों आदि का बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है, भले ही लोगों को उससे दिक्कत हो। न धर्मस्थल बनाने में किसी कानूनी अनुमति की जरूरत महसूस होती है न कोई धार्मिक कार्यक्रम करने के लिए सड़क घेरने में। हो सकता है कि कई मामलों में सच्ची धार्मिक आस्था जुड़ी हो लेकिन अक्सर ऐसे कामों में आर्थिक या राजनैतिक उद्देश्य भी होते हैं। जमीन पर कब्जा करने के लिए धर्मस्थल बनाना एक लोकप्रिय और सुरक्षित रास्ता है और कभी राजनैतिक उद्देश्य से एक धर्म के धर्मस्थल के सामने या पड़ोस में दूसरे धर्म वाले अपना धर्मस्थल बनाते हैं। धर्म का क्षुद्र स्वार्थो के लिए ऐसा इस्तेमाल न धर्म के लिए अच्छा है न समाज के लिए। दूसरी ओर धर्म के उदात्त और आध्यात्मिक स्वरूप के मुकाबले एक बहुत ही स्वार्थपूर्ण और व्यावसायिक इस्तेमाल की राह भी खुल जाती है। दिलचस्प बात यह है कि गुजरात हाईकोर्ट ने अवध रूप से बने धर्मस्थलों को तोड़ने का आदेश दिया था और मोदी सरकार उसका पालन कर रही थी। इसके खिलाफ केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में गई, जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया। वक्त का तकाजा यही है कि केन्द्र, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय मिलजुल कर इस फैसले को लागू करने की कोशिश करें।

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