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वित्तीय संकट से जल्द निजात नहीं : सुब्बाराव

वित्तीय संकट से जल्द निजात नहीं : सुब्बाराव

दुनिया में शुरू हुए आर्थिक असंतुलन और वित्तीय संकट से निकट भविष्य में निजात मिलने की उम्मीद कम ही दिखाई देती है। विकसित और विकासशील देशों की सरकारों ने जिस तरह से वर्तमान वित्तीय संकट से निपटने के लिए अपने खजाने लुटाने शुरू किए हैं उसे देखते हुए दुनिया में एक और असंतुलन का दौर शुरु होने का खतरा खडा होता दिख रहा है।

रिजर्व बैंक गवर्नर डॉ. डी. सुब्बाराव द्वारा आर्थिक संकट पर दिए गए लंबे भाषण का लुब्बोलुआब यही बनता है। उन्होंने कहा है कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जैसे ही हम वर्तमान संकट से पार पाने के मुकाम पर पहुचेंगे वैसे ही वैश्विक असंतुलन की अस्थिरता का नया दौर शुरू हो सकता है।

पूरी दुनिया में कई देशों की सरकारों ने वर्तमान संकट से निजात पाने के लिए अपनी तिजोरियां खोल दी हैं और खर्चे बढ़ा दिए हैं,  इससे उनके राजकोषीय घाटे में भारी वृद्धि हुई है। केन्द्रीय बैंकों ने तंत्र में अतिरिक्त तरलता झोंक कर बैंकों और वित्तीय संस्थानों को समर्थन दिया है।

आने वाले समय में सरकारों को इस समर्थन की कीमत चुकानी होगी। कई विशेषज्ञों को लगता है कि वित्तीय और मौद्रिक नीति के बीच बढ़ने वाला यह तनाव संकट समाप्त होने के साथ ही समाप्त हो जाएगा। डॉ. सुब्बाराव के अनुसार संकट यहीं समाप्त होने वाला नहीं है।

विकसित देशों में राजकोषीय घाटे पर और दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने इसके लिए दो बड़ी वजह गिनाई हैं। उन्होंने कहा है कि विकसित देशों में परिवारों की आर्थिक संकट से खराब हुई स्थिति को फिर से पटरी पर लाने में कुछ साल लग सकते हैं। दूसरी बड़ी चिंता लोगों की उम्र बढ़ने के साथ उनकी सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले खर्च को लेकर है। सरकारों को इन दायित्वों को निभाने के लिए अधिक खर्च करना होगा। इस लिहाज से मौद्रिक नीतियों को आने वाले कई सालों तक लगातार बड़े वित्तीय घाटे की स्थिति से दो चार होना पड़ सकता है।

डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि पूरी दुनिया में राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ा है। अमेरिकी सरकार का राजकोषीय घाटा जो कि 2006 में 2.2 प्रतिशत था बढ़कर 2009 में 13.6 प्रतिशत होने का अनुमान है। ब्रिटेन में यह इसी अवधि में 2.6 प्रतिशत से बढ़कर 10.9 प्रतिशत, यूरोपीय संघ क्षेत्र में यह 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2010 तक 6.1 प्रतिशत तक पहुच जाने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि दुनिया के दस धनी देशों का लोक ऋण जो कि 2007 में कुल व्यय का 78 प्रतिशत तक था 2010 तक 106 प्रतिशत तक और 2014 तक इसके 114 प्रतिशत तक बढ़ जाने का अनुमान है।

डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि अब तक इन राजकोषीय घाटों से निपटने में कोई समस्या खड़ी नहीं दिखाई दी है। हालांकि ऐसा करते समय सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज दरों में वृद्धि का रुख भी बन गया है। केन्द्रीय बैंकों ने बढ़चढ़ कर मौद्रिक उपाय किए हैं और तरलता बढ़ाई है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैलेंस सीट इस वजह से कई गुणा बढ़ गई है। जून 2008 में यह 919 अरब डॉलर पर थी और जून 2009 में बढ़कर 2000 अरब रुपये तक पहुंच गई। फेडरल रिजर्व के पास बैंकों की आरक्षित पूंजी इस अवधि में 20 गुणा बढ़ गई।

जून 2008 में 33 अरब डॉलर से कम पर थी और जून 2009 में उछलकर 661 अरब डॉलर तक पहुंच गर्ई। इससे केन्द्रीय बैंक पर ब्याज भुगतान का बोझ काफी बढ़ गया। ऐसे में फैडरल रिजर्व की ब्याज आय उसके ब्याज भुगतान दायित्वों से अधिक होने का खतरा बढ़ गया है। यदि ऐसा होता है तो पूरी स्थिति वापस संकट में आ सकती है और बैंक को ब्याज भुगतान के लिए सरकार से समर्थन लेना पड़ सकता है। इससे केन्द्रीय बैंक और सरकारों के बीच निर्भरता का गणित उलट सकता है। दुनिया के कई देशों मं यह स्थिति बन सकती है।

भारत का जिक्र करते हुए डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि केन्द्रीय बैंक और सरकार ने आपसी तालमेल के साथ काम करते हुए संकट का सामना किया। पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने निर्यातकों और उद्योगों को सहारा देने के लिए तीन प्रोत्साहन पैकेज दिए और दुविधा यह रही कि ए प्रोत्साहन पैकेज पहले से ही बढ़े हुए खर्चों के साथ आए। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा के लिए बडे¸ बजट की योजनाओं की घोषणा की गई। इसके अलावा किसानों की कर्ज माफी योजना तथा छठे वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल से सरकारी व्यय बोझ काफी बढ़ गया। परिणाम यह हुआ कि सरकार का राजकोषीय घाटा जो कि बजट में शुरू में ढ़ाई प्रतिशत रहने का अनुमाना था बढ़कर 6.2 प्रतिशत तक पहुंच गया और अब 2009-10 में इसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.8 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया गया है।

एसोसिएटिड चैंबर्स ऑफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्री (एसोचैम) द्वारा आयोजित जेआरडी टाटा स्मारक ब्याख्यान में डॉ. सुब्बाराव ने यह भाषण दिया। उन्होंने कहा कि सितंबर 2008 में वैश्विक संकट गहराने के बाद से रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति को तेजी से वापस खींचना शुरू कर दिया था। मौद्रिक उपायों के जरिए नीतिगत ब्याज दरों और बैंकों के नकद आरक्षित अनुपात में तेजी से गिरावट लाई गई। ताकि बैंकों के पास अधिक धन उपलब्ध हो और उसकी लागत भी कम हो। सांविधिक तरलता अनुपात भी एक प्रतिशत घटाया गया इससे भी बैंकों के पास धन की उपलब्धता बढ़ी। क्षेत्र विशेष को ध्यान में रखते हुए पुनर्वित सुविधा का विस्तार किया गया। इन सभी उपायों के जरिए बैंकों में करीब 560000 करोड़ रुपये की नकदी उपलब्ध कराई गई। यह राशि जीडीपी का करीब 9 प्रतिशत है।

उन्होंने कहा कि इन उपायों के जरिए अर्थव्यवस्था को संकट से जूझने के लिए तैयार किया गया। सरकार ने खुद ही आगे बढ़कर खर्च करना शुरू किया ताकि मांग बढ़ सके। इससे सरकारी उधारी में भारी वृद्धि हुई पिछले वित्त वर्ष में कुल सरकारी उधारी बजट अनुमान की तुलना में ढ़ाई गुणा बढ़ गई, जबकि चालू वित्त वर्ष में पिछले साल की बढ़ी उधारी से एक तिहाई अधिक रहने का अनुमान है। मौद्रिक उपायों को सरल बनाने की पीछे रिजर्व बैंक का यही ध्येय था कि बैंक ब्याज दरों में कमी लाएं और उत्पादक क्षेत्रों को जरूरत के अनुरुप धन कर्ज मिले।

डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि इस साल सरकार की भारी उधारी को देखते हुए रिजर्व बैंक ने खुले बाजार में भी हाथ आजमाने का कार्यक्रम बनाया है। रिजर्व बैंक ने पहली बार ऐसा किया है जब उसने सरकारी प्रतिभूतियों के जरिए धन जुटाने के कार्यक्रम के साथ साथ खुले बाजार में खरीद बिक्री करने का कार्यक्रम घोषित किया है ताकि बाजार में अनिश्चितता कम हो और विश्वास का माहौल कायम हो।

उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक के समक्ष इस साल भी बाजार में सरकारी उधारी जुटाने और मौद्रिक तंत्र में पर्याप्त नकदी बनाए रखने का कठिन कार्य है। आने वाले महीनों में औद्योगिक मांग बढ़ने से कर्ज की मांग पूरी करनी होगी।

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