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एक हजारों में मेरी बहना है

एक हजारों में मेरी बहना है

भाई से मिला नेग,
एकबहन के काम आया
दिल्ली नगर निगम में काम करने वाली 32 वर्षीया अनामिका सिकंद के चार भाई हैं। बड़े भाई अंकुर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रबंधक हैं। दूसरे अंकुश एक इनवेस्टमेंटर बैंकर है। तीसरे अमर स्किन स्पेशलिस्ट हैं और चौथे आनंद एक कार रेंटल कंपनी चलाते हैं। राखी के दिन चारों अनामिका के घर सही समय, अपने-अपने परिवारों के साथ आते हैं। अनामिका कहती हैं, ‘हमारे घर में राखी के दिन जलसा सा लग जाता है। बड़ा परिवार है इसलिए हम सब मिलकर खूब इंजॉय करते हैं।’ चारों भाई उन्हें क्या-क्या देते हैं? वह मुस्कुराती हुई कहती हैं, ‘अच्छी आमदनी हो जाती है। वे 1100 से कम नकद नहीं देते और मेरी भाभियां साड़ियों के बिना घर नहीं आतीं। पिछली बार तो मेरे पास राखी के दिन 5500 हजार रुपए इकट्ठे हो गए थे।’

यह बात अलग है कि अनामिका इन रुपयों को व्यर्थ खर्च नहीं करतीं। कई बार वे इन रुपयों से अपने परिवार के लिए एक शानदार पार्टी का आयोजन कर देती हैं। एक बार उनके यहां काम करने वाली आया की छोटी बहन की शादी में उन्होंने रक्षाबंधन पर मिले चार हजार रुपए कंट्रीब्यूट कर दिए थे। चूंकि उसके पिता नहीं थे और बड़ी बहन ही एकमात्र सहारा थी।

हजारों का नेग और अर्थशास्त्र की बात
नोएडा स्थित सेंट्रल स्कूल में अर्थशास्त्र की अध्यापिका 45 वर्षीया पूनम श्रीवास्तव राखी पर मिलने वाले नेग का पूरे साल इंतजार करती हैं। वह कहती हैं, भले यह नेग दो रुपए का हो, दो सौ का या दो हजार का।’ पूनम के बड़े भाई पीयूष एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उपप्रबंधक हैं और छोटे भाई पराग, मर्चेंट नेवी में वरिष्ठ पद पर। छोटे भाई की नौकरी ऐसी है कि वह ऐसे मौकों पर अक्सर घर पर नहीं आ सकते। यह कमी बड़े भाई के द्वारा पूरी कर दी जाती है। पिछली बार उन्होंने पूनम को पांच हजार रुपए नेग में दिए थे। छोटे भाई को राखी भेजी थी तो उन्होंने भी उन्हें दो हजार रुपए भेजे थे। हां, घर आने पर पूनम के लिए साड़ी लाना वह कभी नहीं भूलते। पूनम कहती हैं, ‘हम भाई बहनों ने बहुत संघर्ष करके यह सब कुछ हासिल किया है। कभी ऐसा समय भी था कि राखी पर मेरे भाई मुझसे पैसे उधार लेकर ही मुङो नेग देते थे। तब वे पढ़ते थे और जेब खर्च इतना नहीं मिलता था कि मुझ पर खर्च कर सकें। पर इसके बाद उन्होंने सारी कसर पूरी कर दी।’

इन रुपयों से पूनम क्या करती हैं? वह कहती हैं, ‘अर्थशास्त्र की शिक्षिका हूं। खर्च से ज्यादा बचत पर ध्यान देती हूं। मेरे भाइयों का नेग उनका स्नेह है और इसे मैं किसी छोटी-मोटी चीज पर गंवा नहीं सकती। पिछले 20 सालों से मैं ये रुपए जमा कर रही हूं और ये जमा होते-होते 45 हजार के करीब हो गए हैं। सोचा है कि किसी अच्छे काम में इसे खर्च करूंगी।’

भाई का नेग, भाई को गिफ्ट
मीरा त्रिवेदी और उनका छोटा भाई.. अरे, भाई-बहन की यह कहानी भी काफी दिलचस्प है! लखनऊ की 24 वर्षीय पीआर एग्जीक्यूटिव मीरा का छोटा भाई मयंक बचपन में उसकी गुल्लक से पैसे चुराता था और राखी पर उसे नेग देता था। राखी आने पर मीरा अपनी गुल्लक छुपा देती थी लेकिन फिर भी मयंक गुल्लक ढूंढ ही लेता था। अब मयंक एक कंपनी में ट्रेनी है। पिछले साल मीरा को उसने राखी पर तीन हजार रुपए दिए थे। मीरा इस बार उन पैसों में अपने पैसे जोड़कर मयंक को एक मोबाइल खरीदकर देना चाहती है। वह कहती है, ‘मैंने ये रुपए खर्च नहीं किए थे। मयंक कई महीनों से मोबाइल खरीदने के बारे में सोच रहा है। मैं उसे राखी पर मोबाइल गिफ्ट करना चाहती हूं। बाकी वह इस बार कितना नेग देगा, यह देखना है।’

इस नेग का बदला कैसे चुकाऊं
इलाहाबाद की 28 वर्षीय सलमा रिजवी का कोई भाई नहीं था। पांच साल पहले उनके पड़ोसी गुरपाल सिंह को जब यह मालूम चला तो उन्होंने सलमा को अपनी बहन बना लिया। पांच साल से वह गुरपाल की राखी बहन हैं। हर साल राखी बांधने पर गुरपाल उन्हें कुछ न कुछ रुपए जरूर देते थे। बदले में सलमा इन रुपयों को गुरपाल के बच्चों पर ही खर्च कर देती थीं। इसलिए पिछले दो साल से वह सलमा के लिए कपड़े लाने लगे। पिछले साल उन्होंने सलमा को साड़ी के साथ सोने के बुंदे भी लाकर दिए। सलमा यह बताती हुई रो पड़ती हैं, गुरपाल भाईजान जो लाकर देते हैं, यह उनका प्रेम है लेकिन इसके अलावा भी वह हमेशा हमारे परिवार के साथ होते हैं। पिछले साल उन्होंने मेरे शौहर की बीमारी में उनकी बहुत तीमारदारी की। मैं नकद या सामान के बदले तो उन्हें कुछ न कुछ दे सकती हूं लेकिन उनके स्नेह और सहानुभूति का बदला कैसे चुका सकती हूं। अल्लाह का शुक्र है कि गुरपाल भाईजान से हमारी मुलाकात हुई।
-कल्पना श्री.

एक हजारों में मेरी बहना है
बुधवार को रक्षाबंधन है। प्यारी-प्यारी राखी अपने भाई की कलाई पर बांधने के बाद किसी बहन को किस बात का इंतजार होता है? भई, उस नेग का जो भाई उसके बदले उसे देगा। वैसे सिर्फ  रक्षा के संकल्प से अब काम कहां चलता है.. बहनों को इस मामले में भाइयों की मदद की अब दरकार भी नहीं। हां, नकद या किसी कीमती चीज की बात हो तो मजा आता है। सोचिए अगर किसी बहन के तीन -चार भाई हों तो बात ही क्या है..

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