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महानगरों को माई-बाप सरकार नहीं, कुशल प्रशासन चाहिए

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में आर्थिक विकास की रफ्तार भारत में अभूतपूर्व है। छोटे-छोटे कस्बों से उभरी आत्मविश्वास से भरपूर युवा प्रतिभाए कला से लेकर बैंकिंग और चिकित्सा से लेकर प्रबंधन तक में नई जमीन तोड़ रही हैं। जीवनस्तर बेहतर हुए हैं। स्कूटर और टेलीविजन के बजए अब तरक्की का पैमाना मोटर और एयरकंडिशनर बन चले हैं। इनके नए-नए मॉडल कंपनिया उतारती हैं, और आनन-फानन माल बिक जता है। करोड़ों का कोई न कोई सगा विदेशों में ऊची तालीम या लकदक नौकरी पा गया है, और अच्छी खासी रकम घर भी भेज रहा है। पहले वक्त के नंगे-भीख का कटोरा उठाए ग्रामीण के बजाए आखों पर धूप के चश्मे चढ़ाए ‘नैनो’ में बैठे मुस्कुराते देश के मध्यवर्गीय परिवार आज विदेशी पत्रिकाओं के आवरण नए भारत का चेहरा बन कर छा रहे हैं। लेकिन यह भी एक विश्वव्यापी सचाई है कि जैसे-जैसे देश समृद्ध बनते हैं, उनकी शहरी आबादी बढ़ती और ग्रामीण आबादी सिकुड़ती है। इसकी वजहें खेती की बढ़ती लागत से लेकर शहरों में बेहतर स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी कई तरह की सुविधाओं की मौजूदगी का आकर्षण तक कुछ भी हो सकती हैं। पर गावों से हर रोज उमड़ी पड़ रही अभूतपूर्व भीड़ ने सभी महानगरों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं तथा मुंसीपाल्टी के संसाधनों की खाटें खड़ी कर दी हैं। एक बड़ी बरसात मुंबई और दिल्ली के जीवन को पूरी तरह ठप्प कर देती है। बंगलुरु के स्वर्णिम आई.टी. उद्योग को यातायात की कुव्यवस्था और खराब सड़कों का ग्रहण व्यापने लगा है। स्लम-बस्तियों में पोलियो तपेदिक, मलेरिया और डेंगू सर उठाते हैं; और पूरे महानगर में लगभग मिटाई जा चुकी महामारियों के संक्रमण का भारी खतरा फिर मडराने लगता है। पुलिस व्यवस्था भी अपर्याप्त हो चली है, और दिनदहाड़े लूटपाट, अपहरण और झपटमारी ने लोगों, खासकर बूढ़ों-बच्चों-महिलाओं का घर से बाहर निकलना खतरनाक बना दिया है।
अगर भारत को अपनी समृद्धि की रफ्तार स्वीकार है तो उसे शहरों में जनस्वास्थ्य, कानून-सुरक्षा और परिवहन-यातायात की नई जरूरतें स्वीकारनी होंगी। वर्ना देश की सबसे ऊची प्रतिव्यक्ति आय वाले महानगरों का दम अपने ही विकट ट्रैफिक जमों, घटिया जल-मल व्ययन व्यवस्था हिंसक लूटपाट करने वाले दस्तों और महामारियों के अनियंत्रित प्रकोप से घुट कर रह जएगा। तनिक राहतकारी बात यह है कि अभी दूसरे विकासशील देशों की तुलना में भारत के शहरीकरण की रफ्तार कुछ धीमी है, लिहाज जरूरी कार्रवाई करने के लिए अभी उसके पास हाशिए पर थोड़ी-सी समय की मोहलत मौजूद है। लेकिन यह स्थिति भी अधिक दिन नहीं बनी रहेगी। बिजली-पानी की भीषण किल्लत, खराब सड़कें और सैनिटेशन व्यवस्था, जमीन और जल का गहरा प्रदूषण और जनसंकुल होती गई शहरी मलिन बस्तियों से उपजते रोगों का बेकाबू होना पूरे देश में विकास की रफ्तार पर ब्रेक लगाना शुरू कर देंगे।

जब हमारे महानगर टिकटिकाते टाइम बम पर बैठे दिख रहे हैं। उस वक्त नेतृत्व द्वारा योजना का नाम किस स्वर्गीय नेता के नाम पर हो और उनके कार्यान्वयन को प्रतिपक्ष शासित इलाकों में किस तरह तनिक ढीला बनाया जए, ताकि चुनावों के दौरान उन इलाकों का पिछड़ापन एक मुद्दा बने, इसमें वक्त गवाना एक बीमार सोच है और यह किसी भी दल का भला नहीं करेगा। चिन्ता की बात है कि संप्रग सरकार के ताज बजट ने गरीबों के लिए सस्ते आवासों की योजना के लिए तो खासा धन आवंटन किया है, जबकि भारत निर्माण योजना द्वारा 60 लाख मकानों की जगह 72 लाख मकान बना दिए गए हैं। लेकिन अभी जरूरी भू-सिंचाई योजनाओं में आधा ही काम हो सका है (लक्ष्य था 50 लाख 70 हजर हेक्टेयर का, काम पूरा हुआ 20 लाख 90 हजर हेक्टेयर में)। 50,000 गावों के विद्युतीकरण का लक्ष्य भी अधूरा पड़ा है। बजट में छूटे लक्ष्य पाने के प्रावधानों की बजए राजीव आवास योजना के तहत और आवास बनाने की पेशकश विस्मित करती है।
तीसरी विसंगति यह है कि ढाचे की दुरुस्ती का पूरा दारोमदार निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी पर डाला ज रहा है। उम्मीद की जा रही है, कि देशहित से प्रेरित होकर दोनों क्षेत्र आर्थिक कदमताल करते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी अटकी योजनाओं को साझेदारी द्वारा बना ले जाएंगे। असलियत यह है कि एक लाख करोड़ रुपए की कुल लागत का जो 50 प्रतिशत राष्ट्रीय राजमार्गो को बनाने के लिए निजी क्षेत्र को देना है, उसका आधा भी वह नहीं जुटा पाया है। निर्माण पर अब तक कुल राशि का भी 9.1 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च हुआ है, और वह भी हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा पंजब जसे समृद्ध विकसित राज्यों में। गरीब
पिछड़े राज्यों में नहीं, जिन्हें उनकी सबसे अधिक जरूरत है। इस ढीलेपन की वजहें साफ हैं। अपने यहा सरकारी एजेंसियों और निजी निवेशकों के बीच ठेकों को लेकर गतिरोध आम हैं और राजमार्ग के लिए जरूरी भूमि का अधिग्रहण, मुआवजे की रकम और नियामक संस्थाओं से यथासमय हरी झंडी पाना भी बेहद पेचीदा और समय खाने वाले मसले हैं। देशहित चाहे जो प्रेरणा देता हो, उड़ीसा, बिहार और झारखंड जैसे पिछड़े राज्यों में निजी कंपनिया निवेश से हिचकिचा रही हैं। अब गरीबों को छत और सस्ता अनाज मिले इस पर भला किसी को आपत्ति क्यों हो? लेकिन सवाल यह है कि सड़ते-गलते महानगरों में स्थिति बदतर बनाए बिना महत्वाकांक्षी आवासीय योजनाओं को आकार देना क्या संभव होगा? यह धारणा बेबुनियाद है कि शहरों में उपजने वाला काम गावों को उजड़ रहा है। उल्टे खेती घाटे का सौदा बन जने से खुश्की के दिनों में करोड़ों गाववालों को दो जून की रोटी मुहैया कराने वाला विकल्प पास का महानगर ही बन चला है। इसलिए ग्राम्यजीवन की सुरम्यता और शहरी जीवन से हताश गाव वालों को इंदिरा या महामाया आवास योजना से बने घरों द्वारा वापस लौटाने की सवरेदयी माग कठोर जमीनी सचाई को झुठलाना है।

इसमें दो राय नहीं हो सकतीं, कि गरीब परिवारों को शहरों में वैध छत दिलाने की पेशकश व्यावहारिक भी है, और लोकतंत्र में सरकार का नैतिक उत्तरदायित्व भी। पर जरूरत होने पर चीन भले ही अपने लोगों के निजी सांपत्तिक अधिकारों पर निर्ममता से कुल्हाड़ी चला सकता है, एक लोकतंत्र गरीबों को मुफ्त आवास दिलाने के लिए भी महानगरों के शेष नागरिकों के हकों का विसजर्न तो नहीं कर सकता, और न ही उसे करना चाहिए। सीलिंग के दौरान दिल्ली में चले बुलडोजरों की स्मृतिया शहर के इतिहास का एक काला अध्याय है तो चुनावकाल में दिल्ली के मास्टरप्लान की धज्जिया उड़ाने वाले अवैध स्लमों का आनन-फानन वैध बनाया जाना भी उतना ही गलत है। न्याय का तकाजा है कि सरकारी धनराशि को सबसे पहले महानगरों के सभी नागरिकों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं के सुधार और प्रसार पर खर्च किया जाए। ऐसी हर योजना के कष्टकर पहलू भी जनता झेल ले जती है। हाल में दिल्ली में फ्लाइ ओवरों और मेट्रो लाइनों के निर्माण से हुई तमाम तकलीफों को (यदाकदा घट रही दुर्घटनाओं के बावजूद) लोगों ने बर्दाश्त किया है। गौरतलब है कि यह योजनाए भी सड़कों पर आवाजही भले ही सुगम बनाए, जनस्वास्थ्य की बेहतरी में उनका उल्लेखनीय योगदान नहीं होगा। उसके लिए अलग से जल-बिजली प्रदाय, सीवरेज और सरकारी अस्पतालों की दशा और प्रशासनिक प्रबंधन में ऐसे अतिरिक्त बुनियादी सुधार भी जरूरी बनते हैं।

वित्तमंत्री जी ने अपने बजट भाषण में संकेत दिया कि अभी प्रस्तावित योजनाओं की परिधि तय की जा रही है। क्या हम उम्मीद करें कि वह परिधि जल्द से जल्द बुनियादी ढाचे की इन तमाम शाखाओं और प्रशासनिक व्यवस्था में बेहतरी का मुद्दा भी ले आएगी। 2009 के लोकसभा चुनावों के नतीजे दिखा रहे हैं कि जनता के बीच 2004 के चुनावों तक रहे जतिवाद या धर्म से जुड़े कई भ्रम अब कतई नहीं रहे। जरूरत अब यह है कि नीति-निर्माता विकास की गाठ भावुक मुद्दों से नहीं व्यावहारिक जरूरतों से जोड़ें, और बहस की बजए ठोस कदम उठाने पर बल दें।

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