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अविराम चलने वाली यात्रा

कंप्यूटर के इस युग में भी मैं हाथ से ही लिखती हूं। साहित्य और समसामयिक मुद्दों पर लेखन को छोड़िए, मैं पत्रों के जवाब भी हाथ से लिखकर देने की कोशिश करती हूं। देश-विदेश से मेरे पास प्रचुर डाक आती है। उसमें चिट्ठियों की संख्या अच्छी-खासी होती है। विभिन्न भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की संख्या भी पर्याप्त होती है। डाकिए हम तक क्या-क्या नहीं पहुंचाते? उत्कृष्ट साहित्य से लेकर कानूनी नोटिस तक। अभी-अभी मेरे पास एक ऐसी किताब आई है, जो डाक के संसार से ही सम्बद्ध है। नाम है- ‘भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा।’ लेखक हैं अरविंद कुमार सिंह। नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी यह किताब 416 पृष्ठों की है। यह पुस्तक उन्हें ही समर्पित की गई है, जो कड़ी मेहनत कर घर-घर जाकर डाक पहुंचाते हैं। अमूमन साइकिल से या पैदल चलते हुए। इन डाकियों की बदौलत ही भारतीय डाक व्यवस्था विश्वसनीय बनी हुई है। कठोर परिश्रम कर ही डाकियों ने जनसाधारण में अपनी अलग छवि व प्रतिष्ठा बनाई है।

अरविंद की पुस्तक में डाकियों पर एक स्वतंत्र अध्याय है। लेखक ने बताया है कि एक समय डाकिए डाक पहुंचाने के लिए किस तरह घने वनों से गुजरते थे और कई बार जंगली जनवरों के हमले की भेंट चढ़ जाते थे। कई बार वे दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों और प्राकृतिक आपदाओं की आहुति चढ़ गए। इन सारी प्रतिकूलताओं के बावजूद डाकियों की यात्रा अविराम चलती रही है। उन्होंने देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ाने, पुस्तक-संस्कृति को विकसित करने में भी योगदान किया है। अनपढ़ लोगों को चिट्ठियां पढ़ने की प्रेरणा डाकियों ने ही दी तो वीपीपी से किताब मंगाने की सुविधा देकर डाक विभाग ने लोगों में पढ़ने की वृत्ति को बढ़ावा दिया। डाकियों ने सुदूर ग्राम्यांचलों में मुद्रित किताबें व पत्र-पत्रिकाएं पहुंचाकर पढ़ने की संस्कृति को ताकत दी। अरविंद कुमार सिंह ने पुस्तक एक खंड में 1857 से लेकर बाद के स्वाधीनता संग्रामों में डाक कर्मचारियों की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया है और बताया है कि स्वाधीनता सेनानियों के संदेशों के आदान-प्रदान में डाक कर्मचारियों ने कितने खतरे मोल लिए।

डाक कर्मचारियों ने सिर्फ संदेश ही नहीं पहुंचाए, ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह के दौरान डाक विभाग ने सुदूर अंचलों में नमक पहुंचाने में भी मदद की। भारतीय डाक की बहुआयामी भूमिका को और उसके इतिहास को प्रामाणिकता के साथ पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। अरविंद कुमार सिंह ने मौर्यकाल से लेकर आधुनिक इंटरनेट युग तक की भारतीय डाक प्रणाली का आकलन करते हुए अनेकानेक रोचक तथ्य भी दिए हैं। प्रकारांतर से लेखक ने भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में डाक विभाग के अहम अवदान को रेखांकित किया है, तो पोस्ट कार्ड, मनीऑर्डर, स्पीडपोस्ट सेवा, डाक जीवन बीमा, डाक टिकटों की मनोहारी दुनिया, विदेशों के साथ भारतीय डाक तंत्र के संबंध, भारतीय हरकारों, कबूतरों, हाथी-घोड़ा-पालकी, डाक बंगलों, रेलवे डाक सेना और हवाई डाक सेवा पर अलग-अलग अध्यायों-खंडों में सामग्री दी गई है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे बार-बार महसूस हुआ कि डाक से हम कभी पत्रों का इंताजर करते थे पर समूचा परिदृश्य बदल गया है। आज पत्रों की संख्या बहुत घट गई है।

मेरे पास जो पत्र आते हैं, उनमें किसी ज्यादती का मामला होता है या शोषण का या किसी रचना पर प्रतिक्रिया होती है। व्यक्तिगत बातें आजकल लोग लिखकर नहीं, फोन या मोबाइल से देते हैं। पत्रों का चलन घटना एक गंभीर सांस्कृतिक खतरा है। फिर भी डाक की दुनिया पर एक मूल्यवान किताब लिखने के लिए मैं अरविंद को बधाई देती हूं। अरविंद ने ‘1857 में किसानों और मजदूरों की भूमिका’ पर भी पुस्तक तैयार की है। वे अनछुए मुद्दों को अपने अध्ययन का विषय बनाते रहे हैं। पत्रकारिता करते हुए भी अरविंद ने जनोन्मुख मुद्दे उठाए। जैसे बांग्ला में आशीष घोष उठाते हैं।

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र, इलाहाबाद, बांदा, बहराइच, गोंडा के आदिवासी किस तरह शोषित हैं, किस तरह उनकी जमीन लूटी जा रही है, किस तरह उनका विस्थापन हो रहा है, इसे अरविंद ने अपनी दजर्नों रपटों में उजगर किया। आदिवासी किस तरह विस्थापित हो रहे हैं, इसका दर्द अरविंद की रपटों में हम देख सकते हैं। पूरे देश में आदिवासी एक ही तरह से क्यों विस्थापित होते हैं, शोषण के सबसे ज्यादा शिकार वे ही क्यों होते हैं, मुख्यधारा के तथाकथित सभ्य लोग व सत्ता में बैठे लोग आखिर आदिवासियों के रक्त से स्नान बंद करेंगे?
आदिवासियों को मनुष्य की मर्यादा कब मिलेगी? उन्हें न्यूनतम मानवाधिकार कब मिलेंगे?

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