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मुख्यमंत्री निर्णय पर कायम हैं और मैं अडिग हूं

वे हास्य कविता और मंचीय कविता के जाने पहचाने नाम हैं। इसके अलावा दूरदर्शन पर भी वे लंबे समय से नजर आते रहे हैं। व्यंग्य को कठिन साहित्य कर्म का दर्जा दिलाने वाले अशोक चक्रधर ने मुक्तिबोध पर शोध भी किया है। लेकिन दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष पद के लिए उनका नाम आने से साहित्यकार इतना भड़क उठे कि उन्हें विदूषक तक कह डाला। वैसे वे मॉइक्रोसॉफ्ट के यूनीकोड फोंट मंगल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा चुके हैं। इसके लिए मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है। फिलहाल हिंदी अकादमी विवाद में उलझे अशोक चक्रधर से रू-ब-रू हुए हमारे विशेष संवाददाता गुरुचरन।

हिंदी साहित्यकार आपका इतना विरोध क्यों कर रहे हैं?

मेरी अभी नियुक्ति ही हुई है कि हिंदी के कुछ साहित्यकारों ने मेरे नाम पर विरोध शुरू कर दिया। मैंने अभी तक अकादमी की पहली मीटिंग तक नहीं की और मेरे बारे में कहा जाने लगा कि मैं हिंदी साहित्य को बढ़ावा नहीं दूंगा। यह सब बातें वे किस आधार पर कह रहे हैं, मैं नहीं जानता। यह अकादमी हिंदी साहित्य के लिए तो है ही हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार करने के लिए भी है। यह युवक-युवतियों को हिंदी की टाइपिंग, शॉर्ट हैंड व कम्प्यूटर प्रशिक्षण देती है। कई पुस्तकालय संचालित करती है। हिंदी के मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित करती है। इस अकादमी में हिंदी साहित्य एक गतिविधि है, लेकिन यह मानना गलत होगा कि अकादमी केवल हिंदी साहित्य के लिए ही है ।

पर आपका चयन कैसे हुआ ?
आठ जून को विदिशा में कवियों के साथ, जो कार दुर्घटना हुई थी उस कार के पीछे मैं दूसरी कार में था। आदित्य जी सहित तीन कवियों की मौत हो गई थी। कवि ओम व्यास गंभीर रूप से घायल थे। मैंने तुरंत मध्यप्रदेश व दिल्ली के मुख्यमंत्रियों से संपर्क साधा। मध्यप्रदेश सरकार ने एअर एंबुलेंस से ओम व्यास को दिल्ली भेजने की व्यवस्था की व दिल्ली की मुख्यमंत्री ने अपोलो में उनके इलाज की व्यवस्था कराई। ओम व्यास जी के परिवार के लोग मेरे यहां टिके थे। इसलिए स्वास्थ्य मंत्री किरन वालिया व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी से मेरा फोन संपर्क होता रहा। बाद में मुझे पता चला कि उन्होंने हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर मेरा मनोनयन कर दिया। यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि मध्यप्रदेश व दिल्ली दोनों के मुख्यमंत्री अलग-अलग विचारधारा के होने के बावजूद उनमें कवियों के लिए गहरी संवेदनाएं हैं जो मेरे लिए ही नहीं हर किसी के लिए महत्वपूर्ण बात है।

आप पहले मार्क्सवादी पार्टी के कट्टर समर्थक थे फिर क्या हुआ ?
ये सही है कि मैं पहले माकपा के साथ था। जन नाट्य मंच के संस्थापकों में था। जनवादी लेखक संघ में सक्रिय था। लघु पत्रिकाओं में लिखता था। चांदनी चौक में भीड़ के बीच गीत गाकर पार्टी का प्रचार करता था। कॉमरेड सुरजीत की क्लासों में जाता था। इमरजेंसी में भूमिगत भी रहा। उन दिनों हर समय मुझे यही लगता था कि बस देश में क्रांति आने ही वाली है। फिर मुझे समझ आने लगा कि हमारे साथी अपनी जनता को ही समझने की कोशिश नहीं करते। जबकि मेरा ये मानना था कि जनता से नफरत नहीं संवाद कायम करो।

तब आप कांग्रेसी कैसे हो गए हैं?
न्यूयॉर्क में हुए आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन के रोजाना के क्रियाकलापों पर मैं एक बुलेटिन निकालता था। वहीं विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा से मेरा संपर्क हुआ। उन्होंने पिछले चुनाव में कांग्रेस के लिए मुझसे कुछ गाने लिखवाए। मेरे लिखे छह गानों को कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार का हिस्सा बना लिया। अब इसे आप मेरी कांग्रेस से नजदीकी कह सकते हैं। मैं जब भी जिसके साथ रहा हूं, खुलकर रहा हूं।

असहमति रखने वालों पर आपकी क्या राय है?
मंच संचालन करते वक्त मैंने कभी किसी को अछूत नहीं माना। मैं मंच को संसद की तरह मानता हूं। जिसमें हर किसी को अपनी बात रखने की आजादी है। मैं साम्प्रदायिकता का घोर विरोधी हूं। इसीलिए कुछ समय पहले काशीपुर में एक कवि ने मुस्लिम विरोधी कविता पढ़ने की कोशिश की तो मैंने उसका विरोध किया। इसके जवाब में बजरंग दल के लोगों ने मेरी हत्या कराने तक का प्रयास किया।

इतने विवाद के बाद भी क्या आप अकादमी में रहेंगे?
मैं अकादमी से पिछले लगभग पच्चीस साल से जुड़ा हूं। मेरे पास जनता के प्यार की पूंजी है। मुख्यमंत्री को मुझ पर विश्वास है। वे अपने निर्णय पर कायम हैं और मैं भी अपनी जगह अडिग हूं। मेरा हर प्रकार के साहित्यकार से अनुरोध है कि हिंदी को एक वैश्विक ताकत बनाने में अकादमी की मदद करें। व्यक्तिगत या छिटपुट निंदाओं से क्या हासिल होगा? 

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