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शिकारी खुद यहां शिकार हो गया

शिकारी खुद यहां शिकार हो गया

चौबे जी गये थे छब्बे बनने और बन कर लौटे दुबे। अवध क्षेत्र की यह कहावत क्रिमिनल एडवोकेट आर. के. आनंद पर पूरी तरह लागू होती है। वे गये थे सुप्रीम कोर्ट राहत की चाह में। लेकिन हुआ उल्टा। सबको कोर्ट में राहत दिलाने वाले आनंद को सुप्रीम कोर्ट ने आड़े हाथों लिया। बहुचर्चित बीएमडब्ल्यू हिट एंड रन केस में गवाहों को प्रभावित करने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें दोषी माना। आनंद सुप्रीम कोर्ट गये थे, दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ। दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें बीएमडब्ल्यू केस में गवाहों को प्रभावित करने का दोषी पाते हुए उन पर चार माह तक दिल्ली में प्रैक्टिस करने पर रोक लगा दी थी और दो हजार रुपए का जुर्माना भी ठोका था। सुप्रीम कोर्ट में उन्हें इस बाबत कोई राहत नहीं मिली, बल्कि अपने आदेश में उसने यह टिप्पणी और कर दी कि चार माह प्रैक्टिस की सजा तो इनके लिये कम है, इसे और बढ़ाया जाना चाहिये। अपनी बीएमडब्ल्यू कार से तीन पुलिसकर्मी और छह लोगों को कुचलने के आरोपी पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल के पौत्र संजीव नंदा के केस की पैरवी के दौरान आनंद ने मुख्य गवाह सुनील कुलकर्णी को बयान से पलटने के लिये पटाने की कोशिश की थी, जिसका एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन ने खुलासा कर दिया था। इसी खुलासे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें यह सजा दी थी। आनंद चतुर सुजान हैं।

उनके बारे में मशहूर है कि वह जिस केस को लेते हैं, उसमें जीत पक्की होती है। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उनकी कोई थाह नहीं ले सकता है। वे हैंडपंप की तरह हैं। जितना वे दिखते हैं, असल में वह उससे कई गुना धरती के अंदर होते हैं। लेकिन इस बार आनंद अपने ही मामले में गच्च खा गये। राजनीतिक संबंध भी धरे के धरे रह गये। मेडिकल रिप्रजेन्टेटिव से अपना कॅरियर शुरू करने वाले आनंद का जन्म 15 मार्च 1943 में हुआ। अपनी वकालत की पढ़ाई अमेरिकी दूतावास में काम करते हुए पूरी की। आनंद की पत्नी भारती आनंद दिल्ली हाईकोर्ट में सीनियर पब्लिक प्रोसीक्यूटर हैं। उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा तपेश्वर लंदन में डॉक्टर है और छोटा बेटा पिता के नक्शे कदम पर चल कर वकालत के पेशे में है। आनंद झारखंड से कांग्रेस प्रतिनिधि के तौर पर 2004 में राज्यसभा के लिये चुने गये थे। उन्होंने दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव भी कांग्रेस के टिकट से लड़ा लेकिन वे जीत न सके। आनंद ने बहुत सारे मुकदमें जीते हैं। वे सरकार द्वारा बनाये गये जांच कमीशनों के सामने पेश हुए। इनमें से दो ऐसे कमीशन भी थे, जिनमें दो पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी का भी संबंध था। उन्होंने झारखंड सांसद रिश्वत कांड में भी पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का कोर्ट में बचाव किया था, जिसमे राव की जीत हुई थी। अपने तीस साल के वकील के पेशे में रहते हुये आनंद दो बार दिल्ली बार एसोसिएशन के चेयरमैन भी रहे। बीते तेरह साल से इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेन्ट भी हैं। आनंद इंटरनेशनल बार एसोसिएशन के सदस्य भी हैं। इसके अलावा भी वे बहुत कुछ हैं। कानून की बहुत सारी किताबें भी लिखी हैं। इस सबके बावजूद कॅरियर के इस मुकाम पर इतना बड़ा धब्बा। वह भी सुप्रीम कोर्ट की मोहर के साथ। इस बारे में सोचने की जरूरत है। जीत के लिये हर चीज को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। चाहे कितना बड़ा आदमी ही क्यों न हो, कानून के हाथ बड़े लंबे होते हैं।

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