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11 साल से इंसाफ माँग रहा कारगिल शहीद का पिता

कभी डीएम की दहलीज पर, तो कभी एसडीएम की चौखट पर। कभी तहसीलदार के दफ्तर में, तो कभी थाने के गेट पर। जी हाँ! कारगिल शहीद लांस नायक आबिद खाँ के 70 वर्षीय वालिद गफ्फार खाँ की अब यही जिंदगी है। बेटे ने शहादत देकर कारगिल की लड़ाई जीत ली, तो बाप अपनी ही जमीन के टुकड़े की जंग हार गया। कुछ पूछो, तो बस आँखों से झर-झर कर आँसुओं का दरिया बहने लगा है। कहते हैं कि बस अब यही दिन देखना बाकी था। बूढ़े कंधों में अब इतनी ताकत भी नहीं कि हक की लड़ाई और लड़ सकूँ। चलो जो खुदा करता है, बेहतर करता है।

हरदोई के पाली कस्बे के निवासी कारगिल शहीद के पिता गफ्फार खाँ कहते हैं उन्हें वह दिन आज भी याद है, जब उनके लख्ते-जिगर की शहादत पर घर के बाहर लाल-नीली बत्ती वालों का रेला लगा रहता था। अब हाल यह है कि कोई पूँछता भी नहीं। हद तो यह है कि कारगिल शहीद दिवस पर भी बेटे की मजार पर कोई दो फूल चढ़ाने भी नहीं आता। अपनी पैतृक भूमि पर अवैध कब्जे के विरुद्ध पिछले 11 सालों से लड़ाई लड़ रहे श्री खाँ अब बुरी तरह थक चुके हैं।

भट्ठे पर मजदूरी करके परिवार का पेट पालने वाले श्री खाँ ने इंसाफ के लिए राष्ट्रपति, रक्षामंत्री, थलसेना अध्यक्ष और मुख्यमंत्री तक से गुहार लगा डाली, लेकिन जमीन पर कब्जा आज तक न मिला। डीएम और एसडीएम के साथ-साथ तहसीलदार को अजिर्याँ देते-देते थक चुके श्री खाँ ने बताया कि अब उनकी उम्मीद भी टूट चुकी है। यह हाल तब है, जब भूमि के वरासतनामे में उन्हीं का नाम दर्ज है।

वे बताते हैं कि उनके पिता अली जान खाँ पुलिस में नौकरी करते थे। उन्होंने कभी कोई जमीन किसी को दान में नहीं दी। जो दान नामा दिखाया जा रहा है, वह फर्जी है और तहसीलकर्मियों की मिलीभगत से बनाया गया है। जबकि वरासत में 1972 से ही राजस्व अभिलेखों में गफ्फार खाँ का ही नाम चला आ रहा है। बेटे की शहादत के बाद जो कुछ सरकार से मिला था, उसे बहू समेट कर अपने मायके चली गई।

शहीद के माँ-बाप आज भी ग़ुरबत की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। पेट पालने के नाम पर सिर्फ डेढ़ बीघा खेत बचा है, वह भी बटाई पर दे रखा है। श्री खाँ ने अपनी जमीन से अवैध कब्जा हटाने के लिए पहली अर्जी 1999 में दी थी। उसके बाद से आज तक अफसरों को अजिर्याँ देने का सिलसिला चला आ रहा है, लेकिन अवैध कब्जा नहीं हट सका है। 70 साल के गफ्फार खाँ ने राष्ट्रपति के नाम भेजे अपने पत्र में लिखा है- ‘प्रार्थी कारगिल युद्ध में शहीद लांस नायक आबिद खाँ का पिता है।

प्रार्थी का पुत्र अपनी तनख्वाह से जो पैसा भेजता था, उसी से परिवार का भरण-पोषण होता था। पुत्र की शहादत के बाद परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल हो गया है। महोदय कृपया मेरी जमीन से अवैध कब्जा हटाए जाने की अर्जी सुनी जाए।’ अब उन्हें राष्ट्रपति भवन से आने वाले जवाब का इंतजार है। कहते हैं कि हो सकता है साँस थमते-थमते प्रशासन को मुझ पर रहम आ जाए।

वहीं एसडीएम सवायजपुर महमूद आलम अंसारी अब भी यही कह रहे हैं कि जाँच कराई जा रही है। उन्होंने स्वीकारा कि सम्बन्धित भूमि के राजस्व अभिलेखों में गफ्फार खाँ का नाम ही दर्ज है। इस सवाल पर कि तब श्री खाँ को कब्जा क्यों नहीं दिलाया जा रहा है, तो एसडीएम अपने होंठ सी लेते हैं।

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  • Web Title:बेटे ने जंग जीती और बाप हार गया!