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आइला पहचान कौन

आइला पहचान कौन

बॉलीवुड की एक हिट लोकप्रिय फिल्म है ‘चाची 420’। इस फिल्म की एक खास बात है कि कमल हासन ने इस पूरी फिल्म में (कुछ शुरुआती और अंतिम प्रसंगों को छोड़कर) चाची की भूमिका निभाई है। दिलचस्प बात है कि यह भूमिका उन्होंने महज फिल्म में हास्य पैदा करने के लिए नहीं निभाई, बल्कि चाची के किरदार को उन्होंने बेहद गंभीरता से निभाया है। चाची के रूप में उनका गैट-अप, उनकी बॉडी लैंग्वेज और उनका अभिनय देखने लायक है। वास्तव में पुरुषों द्वारा महिलाओं के किरदार निभाना या फिर महिलाओं द्वारा पुरुषों के किरदार निभाने का बॉलीवुड में एक लंबा इतिहास रहा है। बॉलीवुड में एक ऐसा समय भी रहा है, जब पुरुष ही नायिकाओं की भूमिका निभाते थे। यह वह समय था, जब फिल्मों में लड़कियों के काम करने को अच्छा नहीं माना जाता था और अच्छे घरों की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करती थीं। इस स्थिति को अगर छोड़ दें तो भी तमाम ऐसी फिल्में हमें दिखाई पड़ती हैं, जिनमें नायक स्त्री परिधानों में नजर आए। हाल ही में रिलीज फिल्म ‘पेइंग गेस्ट’ में भी जावेद जाफरी और श्रेयास तलपड़े ने कुछ ऐसी ही भूमिकाएं कीं।

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी बड़े परदे पर खुद को एक स्त्री के रूप में देखने का लोभ नहीं छोड़ पाये। उन्होंने ‘लावारिस’ फिल्म में स्त्री परिधानों में बाकायदा एक गीत गाया- मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..  ऐसा नहीं है कि बड़े परदे पर केवल नायक ही स्त्री रूप में दिखा, इसके विपरीत नायिकाओं को भी कुछेक फिल्मों में पुरुष रूप में देखा गया। याद कीजिए ‘विक्टोरिया नंबर 203’, जिसमें सायरा बानो फिल्म के काफी हिस्से तक एक पुरुष के रूप में मौजूद रहीं। इसी तरह ‘हिम्मत’ में मुमताज पुरुष रूप में दिखाई गयी थीं। मुमताज और फिल्म के नायक पर एक बेहद लोकप्रिय गाना भी पिक्चराइज हुआ था-अगर तू लड़की होती.. ‘बैंडिट क्वीन’ में सीमा बिस्वास  के पूरे परिधान पुरुषों वाले ही थे। लेकिन बॉलीवुड में चल रही क्रॉस ड्रेसिंग की बात की जाए तो नायिकाओं के मुकाबले नायकों की ही संख्या ज्यादा है, जो विपरीत लिंगी परिधानों में दिखाई पड़ते हैं। गोविंदा ने ‘आंटी नंबर 1’ में स्त्री का किरदार निभाया। ‘बाजी’ में आमिर खान एक सुंदर सी लड़की के रूप में दिखाई दिये थे। इससे पहले विश्वजीत, संजीव कुमार, पेंटल, षि कपूर, सलमान खान, प्राण, अनुपम खेर जैसे अभिनेता भी कभी-कभी बड़े परदे पर स्त्री रूप में दिखाई दिये हैं। लेकिन बीच में एक ऐसा दौर आया था, जब क्रॉस ड्रेसिंग की प्रवृत्ति कम दिखाई दे रही थी। लेकिन बॉलीवुड के बदलते मिजाज के चलते एक बार फिर से यह प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। युवा दिलों की धड़कन कहे जाने वाले इमरान खान ‘जाने तू या जाने ना’ में साड़ी पहन कर एक गाना गाते दिखाई पड़ते हैं। ‘अग्ली और पगली’ में रणवीर शौरी पेटीकोट पहन कर साइकिल चलाते दिखाई पड़ते हैं। रानी मुखर्जी यशराज फिल्म्स की ‘दिल बोले हड़िप्पा’ में एक सिख के रूप में दिखाई देंगी। क्रॉस ड्रेसिंग के मामले में छोटे परदे ने भी काफी उदारता दिखाई है। कॉमेडी शोज में तो आये दिन परफोर्मेस देने वाले विपरीत लिंगी परिधानों में ही दिखाई पड़ते हैं। मजेदार बात है कि सोनी पर कॉमेडी धारावाहिक का एक पूरा एपिसोड क्रॉस ड्रेसिंग पर ही आधारित था।

अब अहम सवाल आता है कि ऐसा क्यों होता है? अगर बाहरी तौर पर देखा जाए तो फिल्मों में कई बार नायक या नायिका को अपनी पहचान छुपानी पड़ती है। मिसाल के तौर पर ‘बीवी और मकान’ नामक एक फिल्म में दो दोस्त मकान की तलाश कर रहे हैं। लेकिन कोई भी उन्हें इसलिए मकान नहीं देता, क्योंकि वे दोनों अविवाहित हैं, जबकि मकान मालिक पति-पत्नी को मकान देना चाहता है। लिहाजा दोनों में से एक भेस बदल कर स्त्री रूप धारण कर लेता है, इसलिए वह विपरीत लिंगी रूप में नजर आता या आती है। कई बार ऐसा भी होता है कि महज हास्य पैदा करने के लिए नायक या नायिका विपरीत रूपों में दिखाई पड़ते हैं। लेकिन इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी दिखाई पड़ता है। हमारे समाज में भगवान शिव को अर्धनारीश्वर का दर्जा दिया गया है। माना जाता है कि परम पुरुष भगवान शिव ने जब ब्रह्मांड की रचना कर दी तो खुद को अकेला महसूस किया। उनके मन में विचार आया : एकोùहं बहुस्यामि यानी मैं एक हूं अनेक हो जाऊं। इसके बाद उन्होंने खुद को दो हिस्सों में बांट लिया। एक हिस्सा वह खुद थे और दूसरा पार्वती का था। इस तरह अर्धनारीश्वर की अवधारणा पूर्ण होती है। यों भी कहा जाता है कि हर व्यक्ति के भीतर एक स्त्री और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष होता है। बॉलीवुड में क्रॉस ड्रेसिंग का यह ट्रेंड कहीं इसी प्रवृत्ति को संतुष्ट करने का परिणाम तो नहीं?

इसके पक्ष में एक विज्ञापन याद आता है। बॉलीवुड में मिस्टर परफेक्ट कहे जाने वाले आमिर खान टाटा स्काई के एक विज्ञापन में आधे पुरुष और आधे नारी के रूप में नजर आये थे। 70 सेकेंड के इस विज्ञापन में आमिर का आधा हिस्सा एक पंजाबी लड़की का था और आधा एक लड़के का। दिलचस्प रूप से इस विज्ञापन को भी खास पसंद किया गया था। क्रॉस ड्रेसिंग के इस पौराणिक और मनोवैज्ञानिक तर्को को यदि छोड़ दें और चीजों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक बात और इसके पक्ष में कही जा सकती है। वह यह कि बॉलीवुड की नयी पीढ़ी ने सेक्स से जुड़े सारे पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए क्रॉस ड्रेसिंग से जुड़े सारे प्रयोगों को स्वीकारा है। प्रतियोगिता के इस युग में वे सफलता और कम्फर्ट चाहते हैं, इसके लिए उन्हें चाहे जिस तरह का रूप अख्तियार करना पड़े।

क्रॉस ड्रेसिंग के जरिये पुरुषों द्वारा महिलाओं के किरदार निभाने का बॉलीवुड में एक लंबा इतिहास रहा है। पर बॉलीवुड में एक समय ऐसा भी था, जब पुरुष ही नायिकाओं की भूमिका निभाते थे। यह वह समय था, जब फिल्मों में लड़कियों के काम करने को अच्छा नहीं माना जाता था और अच्छे घरों की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करती थीं। इस स्थिति को अगर छोड़ दें तो भी तमाम ऐसी फिल्में हमें दिखाई पड़ती हैं, जिनमें नायक, बेशक कुछ ही दृश्यों में सही, स्त्री परिधानों यानी क्रॉस ड्रेसिंग में नजर आए।

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