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इस जमीं में सोई हैं हस्तियां महान

पिछले महीने मैं छुट्टियां बिताने के लिए पेरिस में था। एक दिन हमने दो ग्रुप बनाए, एक में मेरी पत्नी और मेरी बेटी थे, वे खरीदारी के लिए निकल पड़े। दूसरे में मैं और मेरा बेटा, हम अपने नायकों की मजारों को खोजने निकल पड़े। हम एफिल टॉवर के पीछे ठहरे हुए थे। मोंटपैरेनसे के कब्रगाह से तकरीबन दो किलोमीटर दूर। यह गर्मियों की सुहानी दोपहर थी, तापमान 20 डिग्री सेल्सियस के आस-पास। हम पैदल ही चल पड़े। हम जिन इमारतों के पास से गुजरे वे खूबसूरत थीं। 19वीं सदी की बनी हुई। उनकी खूबसूरत छोटी बालकनी में फूलों वाले गमले सजे थे। लेकिन जल्द ही हम इस वर्तमान से निकलते हुए अतीत में पहुंच गए। हमारी मंजिल से ठीक पहले की जगह थी, बहुत बड़ा और बदसूरत सा मोंटपैरेनसे रेलवे स्टेशन।

आधुनिक इमारतों के बीच यह कब्रिस्तान शांति के नखलिस्तान की तरह था। इसके रास्तों में हर थोड़ी दूरी पर खूबसूरत छतरी वाली बेंच थीं। प्रवेश द्वार पर एक नक्शा लगा था, जिसमें बताया गया था कि यहां कौन-कौन सी बड़ी हस्तियां दफ़न हैं। उन तक पहुंचने का रास्ता भी बताया गया था। कुछ खास जगहें थीं, जहां मैं जाना चाहता था और कुछ दूसरी जगहें थीं, जहां मेरा बेटा। कुछ ऐसी भी थीं, जहां हम दोनों ही जाना चाहते थे। ऐसी ही एक जगह वह थी, जहां लेखक दंपत्ति ज्यां पॉल सार्त् और सिमोन दे बोवा को दफ़नाया गया है। सार्त् का निधन 1980 में हुआ था, जबकि उनकी प्रेमिका, उनकी संगिनी और उनकी सहयोगी का निधन इसके छह साल बाद हुआ था। कब्रिस्तान के मुख्य द्वार के दाहिनी तरफ उन्हें भी सार्त् के साथ एक सुंदर सरल सी यादगार के रूप में जगह दे दी गई थी। हमें वहां सिर्फ सार्त् का एक उपन्यास मिला, जिसे उनके किसी प्रशंसक ने वहां रख दिया था। सार्त् की मजार कब्रिस्तान के आखिरी सिरे पर है। दूसरे सिरे पर उनके सहपाठी और लंबे समय तक उनके प्रतिद्वंद्वी रहे रेमंड एरॉन की कब्र है। दोनों एक ही साल पैदा हुए थे और बचपन में करीबी दोस्त भी थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस पर जर्मनी का कब्जा हुआ तो दोनों ही एक समान नाजियों से नफरत करते थे। लेकिन यह जंग खत्म होने के बाद दोनों के रास्ते जुदा हो गए। सार्त् यूटोपियन वामपंथी थे और क्रांतिकारी बदलाव चाहते थे, इसलिए वे सोवियत संघ के समर्थक हो गए। एरॉन व्यवहारिक उदारपंथी थे, वे सहयोग और समन्वय की राजनीति करते थे, इसलिए वे अमेरिका की तरफ झुक गए। दोनों बहुत अच्छे लेखक थे, सार्त् उपन्यास और दर्शनशास्त्र में सिद्धहस्त थे, जबकि एरॉन की महारत समाजशास्त्र और मौजूदा हालात पर किताबें लिखने में थी।

मैंने सार्त् को बहुत कम पढ़ा है, लेकिन मैंने अपनी मौलिक बौद्धिक चेतना एरॉन से हासिल की है। समाजशास्त्र के शोध छात्र के तौर पर मैंने उनकी किताब ‘मेन करंट इन सोशियोलॉजिकल थॉट’ कई बार पढ़ी। इस किताब में 19वीं सदी और शुरुआती 20वीं सदी के महान सामाजिक विचारकों पर खूबसूरत लेख हैं। यहां इस कब्रगाह में एक तरफ एक क्रांतिकारी अपनी उस प्रेमिका के साथ दफ़न था, जिससे उसने कभी शादी नहीं की और दोनों अपने खुले संबंधों के लिए प्रसिद्ध रहे। दूसरी ओर एक बुर्जुआ उदारपंथी अपने पूरे परिवार अपने पिता, मां, चाचा, पत्नी और बेटे के साथ दफ़न था। एरॉन जर्मनी में पढ़े थे, जिसका शायद उन्हें फायदा भी मिला होगा। उनकी किताब के दो मुख्य विचारक कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर जर्मन ही थे। ये दोनों आधुनिक समाजशास्त्र की नींव रखने वाली मशहूर त्रिमूर्ति का हिस्सा थे, जिसका तीसरा हिस्सा फ्रांस के ही एमिले दुर्खीम थे। पहले मैंने उनकी किताब का सारांश पढ़ा और उसके बाद मेरे अध्यापक ने मूल किताब पढ़ने को कहा। मैंने मार्क्स, वेबर और दुर्खीम को भी पढ़ा। मुझे पता पड़ा कि फ्रांस के ये महान विचारक भी इसी कब्रगाह में दफ़न हैं। उनकी मजार पर जापान के एक समाजशास्त्री ने तारीफ में कुछ लिखा था, उसमें कुछ शब्द मैंने भी जोड़ दिए।

बाकी जिन मजारों में हम गए उनमें से एक थी मशहूर नाटय़ लेखक सैमुअल बेकेट की मजार, जिस पर कई श्रद्धांजलियां लिखी गई थीं। मेरा बेटा खासतौर पर सर्जे जेंसबोर्ग की मजार पर जाना चाहता था, जिसके बारे में मैंने कभी सुना भी नहीं था। मुङो बताया गया कि वे महान गायक और गीतकार थे। उनकी मजार पर काफी सजावट थी। गमले, गुलदस्ते और कार्ड थे। इस सजावट को छोड़ दें तो सभी मजारों से समान सुलूक किया गया था। वे समान दूरी पर थीं, हर माजर के पास एक तख्ती पर लिखा गया था कि इसमें कौन है। लेकिन इस पर किसी का ओहदा या कोई और पहचान नहीं लिखी गई थी। अकेली सजावटी मजार शतरंज खिलाड़ी अलेक्जेंडर अलेखिने की थी, इस पर तकरीबन दस फीट ऊंचाई का पत्थर लगा था। पत्थर पर खिलाड़ी के साथ शतरंज फेडरेशन के कुछ अधिकारियों का नाम भी थी, जिन्होंने शायद इसे बनवाने में खर्च किया होगा। ताकि खिलाड़ी के साथ नौकरशाहों के नाम भी रह सकें।

बाहर निकले तो दोपहर के दो बज चुके थे। हमने वहां एक भारतीय भोजनालय में खाना खाया। इसे एक पाकिस्तानी चला रहा था, जिसे हमने ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप जीतने की बधाई भी दी। और फिर मेट्रो में बैठकर अगली मंजिल की ओर बढ़ गए। यह मंजिल थी, ले पेरे लचेस का कब्रगाह। जो बहुत बड़ा था और जहां घूमना व ढूंढना काफी मुश्किल था। हमने गेट पर जो विवरण पुस्तिका खरीदी, उसमें यहां की लगभग पांच सौ महत्वपूर्ण मजारों का जिक्र था। समय कम था, इसलिए कुछ ही तक जा सकते थे। हम पहुंचे बालजाक की मजार पर जहां इस मशहूर उपन्यासकार की आवक्ष प्रतिमा लगी हुई थी। इसके बाद हम ऑस्कर वाइल्ड की मजार पर पहुंचे। इस पर हर जगह प्रेम के संदेश लिखे हुए थे। वहां कई अमेरिकी (निश्चित तौर पर समलैंगिक) फोटो खिंचवाने के लिए घूम रहे थे। आखिर में हम चोपिन और जिम मोरीसन की मजार पर गए। अमेरिकी रॉक स्टार मोरीसन का 27 साल की उम्र में ही मादक पदार्थो की ओवरडोज़ से निधन हो गया था। पेरिस के इन कब्रिस्तानों की खास बात यह है कि वहां फ्रांसीसी ही नहीं विदेशियों की भी मजार हैं। जैसे बनारस के बारे में कहा जाता है कि वहां अगर कोई हिंदू मरे तो सीधे स्वर्ग पहुंचता है। लगता है कला जगत में वैसी ही कुछ धारणा पेरिस के लिए भी है। ऐसा क्यों है कि मशहूर आधुनिक लेखकों, संगीतकारों और विचारकों ने अपने प्राण त्यागने के लिए पेरिस को ही चुना?

ramguha@vsnl.com

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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