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बुरा मानो या भला: लोगों को बेवकूफ न बनाएं

पिछले साल नवंबर में मुंबई ने एक बेहद नाटकीय ट्रेजेडी देखी थी। फिलहाल उसका इंटरवल हो चुका है। उस ट्रेजडी का आधा हिस्सा अभी बाकी है। इंटरवल पर परदा स्टार मोहम्मद अजमल आमिर ने डाला था। उसे सब कसाब कहते हैं। हत्यारा कसाब।  उस नवंबर में कसाब और उसके नौ साथी हत्यारों ने मिलकर 171 हिंदुस्तानियों को मार डाला था। उसमें आदमी, औरत, बच्चे सभी थे।

हिंदू, सिख, ईसाई, मुसलमान किसी को नहीं बख्शा गया था। आधा दजर्न विदेशी भी उनका निशाना बने थे। ये सब कुछ ही घंटों में हो गया था। उन हत्यारों ने हजारों करोड़ों रुपए की जायदाद बर्बाद कर दी थी। हिंदुस्तान में टूरिज्म का हाल बेहाल कर दिया था। हजारों लोगों से उनकी रोजी-रोटी छीन ली थी। किस कदर तबाही मचाई थी उन लोगों ने। इंटरवल से ठीक पहले कसाब ने अचानक खुली अदालत में जज के सामने अपना गुनाह कबूल लिया था। और गुजारिश की थी कि उसके जुर्म की सजा दे दी जाए। मुझे तो कोई शक नहीं कि उसने यह बयान खुद ही दिया होगा। और बिना किसी दबाव के अपने जुर्म का इकबाल किया होगा। वह जरूर जानता होगा कि इस तरह के जुर्म की सजा क्या होती है? वह सजा फांसी का फंदा ही हो सकती है। कसाब के इस इकबालिया बयान के बावजूद जज ने खट से अपना फैसला नहीं सुनाया। यह अच्छा ही था। आखिर कसाब अपने इकबालिया बयान पर फिर से सोच सकता है। अब यह कसाब पर है कि अपने बयान को बदले या न बदले, लेकिन उसने अपने गले में फंदा तो डाल ही लिया है। और वह फंदा आज नहीं तो कल, उसकी जान ले ही लेगा। तब उसकी मौत पर शायद ही कोई आंसू बहाने वाला हो। इंटरवल के बाद का नाटक अभी होना बाकी है। कसाब ने इस साजिश में शामिल कई पाकिस्तानियों के नाम लिए हैं। उसने एक हिंदुस्तानी अबू जंदाल का नाम भी लिया है। मेरे खयाल से उसे मदद करने वालों में और भी हिंदुस्तानी होंगे। इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नहीं है। सिर्फ एक आदमी की मदद से ये नहीं हो सकता। ऐसा खौफनाक काम करने के लिए कई लोगों की जरूरत पड़ी होगी। हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी सरकारें फिलहाल मिल जुलकर आतंकवाद से निपटने की कसमें खा रही हैं। लेकिन उन्हें साबित करना होगा कि वे सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें नहीं कर रहे हैं। वे लोगों को बेवकूफ नहीं बना रहे हैं। अब देखना यह है कि दोनों सरकारों के हुक्मरान अपना-अपना रोल कैसे अदा करते हैं?


दीपमाला की गायकी
सीरी फोर्ट के खेल गांव में मैंने एक शाम मोहन परिवार के साथ गुजारी थी। उसकी खुशनुमा याद अब भी है। उस परिवार में विश्वनाथ प्रताप सिंह का आना-जाना था। प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में भी। उनके पड़ोसी थे पेंटर जतिन दास। उनकी मशहूर और खूबसूरत बेटी नंदिता तब छोटी थी। मुझे अक्सर जतिन तो दिख जाते थे, लेकिन नंदिता को मैं कभी नहीं देख पाया। और मैं लोगों पर यह रौब गांठने से रह गया कि देखो नंदिता को तो मैं बचपन से जानता हूं। मुझे मोहन परिवार इसलिए याद आता है कि उन्हीं के यहां वी. पी. सिंह से जोरदार बातचीत हुई थी। और उसके बाद कमाल का कायस्थ खाना मिला था। वैसा खाना मैंने पहले कभी नहीं खाया था। फिर बातों और खाने के बाद दीपमाला की ग़ज़ल सुनने को मिली थीं। उन्होंने फ़ैज़ और ग़ालिब के कलाम खूबसूरती से गाए थे। एक ग़ज़ल की गायकी तो मेरे जेहन से हट ही नहीं पाती। वह हफ़ीज़ जलंधरी की मशहूर ग़ज़ल ‘अभी तो मैं जवान हूं’ की गायकी थी। उस मस्त ग़ज़ल को क्या गाया था दीपमाला ने! लखनऊ में जन्मी और पली बढ़ी हैं दीपमाला। भातखंडे कॉलेज से संगीत सीखा। और दिल्ली घराने को अपना लिया। लंबे चौड़े कैवेलरी ऑफिसर मोहन से उन्होंने शादी की। और शादी के बाद दिल्ली उनका घर हो गया। ग़ज़ल गायकी के बाद वह लोक गायन की ओर बढ़ीं। बुंदेलखंड, ब्रज, अवधी और भोजपुरी में लोक गीत गाने लगीं। उनके लोकगीतों ने देश-विदेश में धूम मचाई। वेस्टइंडीज, सूरीनाम, मॉरीशस और फीजी में तो दीपमाला की दीवानगी ने हदें पार कर दीं। शर्मिला टैगोर की अध्यक्षता वाले सेंसर बोर्ड में भी वह हैं। पिछले दिनों अरसे बाद दीपमाला से मुलाकात हुई। वह अपना ताजा कैसेट देने आई थीं। लेकिन उन्हें क्या पता कि मुझे सुनने में कितनी मुश्किल होती है!

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