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आखिरी दिनों में तिलक

आज तिलक महाराज की पुण्यतिथि है। एक अगस्त, 1920 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अंतिम सांस ली थी। आखिरी दिनों में वह मुंबई में थे। पिछले कुछ महीनों से शरीर परेशान कर रहा था। डायबिटीज काफी सालों से थी। जुलाई में तो मलेरिया भी हो गया। लेकिन उन्हें भरोसा था कि अभी और जीएंगे। एक दिन बुखार बहुत बढ़ गया, तब उन्होंने कहा था, ‘अभी तो मैं पांच साल और जीऊंगा।’ लेकिन बुखार ने उन्हें जीने नहीं दिया। अक्सर उनके साथ भगवद्गीता रहती थी। बचपन से ही गीता के साथ जीने की आदत थी। सोलह साल की उम्र में मृत्युशैय्या पर लेटे पिता को गीता सुनाई थी। तब से गीता उनकी जिंदगी का हिस्सा हो गई थी। वह अस्पताल में भी उनके सिरहाने थी। आखिरी के तीन दिन तो बेहोशी में ही बीते थे। एक बार जब उनकी बेहोशी टूटी, तो वह कह रहे थे, ‘जब तक हमें स्वराज नहीं मिलता, तब तक हम संपन्न नहीं हो सकते।’ गीता के किसी श्लोक को बुदबुदाते भी सुना गया था।

चार साल पहले उनकी षष्टिपूर्ति मनाई गई थी। तभी से उनका शरीर जवाब देने लगा था। लेकिन देश की आजादी के लिए काम करने का जज्बा उन्हें आराम नहीं करने दे रहा था। आखिरी साल में शरीर और परेशान करने लगा था। इधर-उधर यात्रएं करते हुए वह मुंबई चले आए थे। वह लगातार स्वतंत्रता पर ही सोच रहे थे। गीता उसमें भी भागीदार थी। एक दिन कहने लगे कि स्वतंत्रचेता मनुष्य निष्काम कर्मयोगी ही हो सकता है। अगर वह निष्काम नहीं होगा तो स्वाधीनता की खोज अधूरी होगी। आजादी के अलावा एक और इच्छा उनकी अधूरी रह गई थी। वह भी देश से ही जुड़ी थी। उनको पूरा भरोसा था कि वह रहें या न रहें लेकिन आज नहीं तो कल देश को आजाद होना ही है। वह जानते थे कि इस देश-समाज में धर्म गहराई से पैठा है। और आधुनिक सोच के बिना बेहतर समाज नहीं बन सकता। स्वामी विवेकानंद से वह प्रभावित थे। उनकी कामना थी कि स्वामी जी जैसे आधुनिक हों अपने शंकराचार्य। उसके लिए वह शंकराचार्यों से बात भी करना चाहते थे। लेकिन वह मिशन अधूरा रह गया। स्वतंत्रता को जन्मसिद्ध अधिकार मानने वाले तिलक महाराज को नमन।

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