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गरीबों की बेबसी

सरकार विधेयक पेश करने जा रही है कि निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए। गरीब बच्चों व रईस बच्चों के बीच की खाइयों को कौन भरेगा। निजी स्कूलों में बच्च एक दिन भी बगैर प्रेस किए हुए कपड़े नहीं पहन सकता। अध्यापक दंड देते हैं और सहपाठी मजाक बनाते हैं। बच्चे आपस में अपने-अपने टिफिन बॉक्स को दिखाते हैं, खाने के लिए अच्छी चीजें लाते हैं और जो बच्च सामान्य खाना ले जाता है उसका मजाक बनाया जाता है। गरीब घर का बच्चा अपनी दो रूखी-सूखी रोटियों को उनके बीच कैसे खाएगा। क्या सरकार उसे अच्छा खाना पैक करके दे सकती है? प्रत्येक महीने माता-पिता को जो मीटिंग के लिए बुलाया जाता है, क्या गरीब मां-बाप अपनी एक दिन ही दिहाड़ी को छोड़कर उसमें जा सकेंगे? क्या अंग्रेजी बोलने वाले अध्यापकों की बातों को अनपढ़ माता-पिता समझ पाएंगे? यदि सरकार गरीब बच्चों का भला चाहती है तो सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के पदों की पूर्ति करे, स्कूलों में सुधार करे। गरीब बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही अच्छी सुविधा प्रदान करे।

विक्रान्त कुमार तोगड़, भनौता, उत्तर प्रदेश


नहीं चलेंगे, एक देश में दो कानून
गाजियाबाद में कांवड़ की वजह से बंद रास्ते से एक फौजी जिप्सी ने निकलने की कोशिश की। इंतजाम देख रहे सिविल डिफेंस वालों ने मना किया तो उनसे भिड़ गए। अखबारों में छपा है कि उन्होंने पुलिस और मीडिया को भी धमकाया। जिप्सी में बैठे फौजियों ने ऐसा बर्ताव किया, जैसे कायदे कानून उनके लिए नहीं। दक्षिण भारत के किसी शहर से दो दिन पहले खबर थी कि पत्नी की हत्या के आरोप में बंद एक फौजी अपना मामला सेना की अदालत में चलवाना चाहता है। इसी देश की जनता के टैक्स से उनको छठा वेतनमान मिलना है, एक देश में दो कानून क्यों?

ए. के. गौड़, ग्रेटर कैलाश, नई दिल्ली

इंजीनियरों का उत्पादन
‘इंजीनियरों की खेती में हमने चीन को पछाड़ा है’ यह अनुमान है केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा सचिव आरपी अग्रवाल का। यहां ‘इंजीनियरों की खेती’ कहना उचित नहीं है, क्योंकि हमारे देश में इंजीनियरों को तपस्या की डाई (सांचे) में तपा-तपा कर ढाला जाता है। जिसमें मां-बाप की भी मेहनत होती है। दरअसल, चीन हमसे सौ साल पहले का विकसित देश है।

राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

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