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नशा है, नशा है

आजकल 8 घंटे की नौकरी का फंडा तकरीबन बेमानी हो चुका है, और कॉपरेरेट माहौल में लोग तमाम श्रम कानूनों को धता बताते हुए खुद अपनी मर्जी से ज्यादा से ज्यादा वक्त ऑफिस को देते नजर आते हैं। काम के नशे में चूर आज के ‘वर्कहॉलिक’ युवा जब ऑफिस में ड्यूटी पर नहीं होते, तब भी ब्लैकबेरी फोन या डाटाकार्ड के जरिए ऑफिस के काम से जुड़े रहते हैं। जहिर है, उन्हें इस अंधी दौड़ में शामिल होने की तगड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है।

- ‘वर्कहॉलिक’ लोगों की निजी जिंदगी तकरीबन खत्म हो जाती है। बाकी नाते-रिश्तेदार तो दूर, परिवार के लोग ही उनके दर्शन को तरस जाते हैं। ऐसे लोगों को किसी के बर्थडे या और अहम मौके की याद नहीं रह पाती, जिससे सामाजिक जीवन भी तहस-नहस हो सकता है।

- जो लोग महज काम में डूबे रहते हैं, उनकी प्रोफेशनल लाइफ भी कोई बहुत संतोषप्रद नहीं होती। ऐसा निजी जिंदगी के पटरी पर न रह पाने के कारण ही होता है। फिर ‘वर्कहॉलिक’ होने का मतलब ये भी नहीं होता कि आप पेशेवराना तौर पर भी अव्वल ही हों। जो लोग काम बांटना नहीं जानते, उन्हें मजबूरन ‘वर्कहॉलिक’ बनना पड़ता है।

- ‘वर्कहॉलिक’ लोग हरदम तनाव और दबाव में होने के कारण तेजी से गंभीर बीमारी की तरफ बढ़ते जाते हैं। उन्हें मानसिक अवसाद भी ज्यादा होता है।

इस मर्ज की दवा क्या है?
काम के नशे की लत से बचे रहने के लिए जरूरी है कि शुरू में ही इसके लक्षणों को पहचान कर बचाव का रास्ता अपना लिया जाए। कंपनी बदल कर या क्लिनिकल थरेपी से भी इससे छुटकारा पाया जा सकता है। एक तरकीब और है: एकांत में बैठकर सोचें कि क्या आज आप वाकई कामयाब हैं? अगर हां, तो किस कीमत पर? इसलिए संतुलन बनाना सीखें।

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