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दाल का काला

जिस तरह से दाल की कीमतें बढ़ रही हैं उससे दाल में कुछ ज्यादा ही काला  नजर आता है। इसकी कोई एक वजह होती तो उसे चिह्नित कर तत्काल कार्रवाई का सुझाव दिया जा सकता था। लेकिन दिक्कत दाल के उत्पादन, वितरण और आयात सभी स्तरों पर है। इसलिए महंगाई के मौजूदा संकट से फिलहाल उबर भी लिया जाए तो भी दाल के बारे में गंभीरता से सोचना होगा, क्योंकि दाल के बिना न तो रोटी चलने वाली है न ही चावल। बाजार के विशेषज्ञ दाल की ऊंची कीमतों के लिए जमाखोरों और सटोरियों को दोषी ठहरा रहे हैं। अगर उनसे निपटने के लिए सरकार सख्ती नहीं कर सकती तो कम से कम आयात होकर आई उस दाल को तो संभाल लेना था, जो हजारों टन की मात्र में हमारे बंदरगाहों पर पड़ी सड़ रही हैं। इस कुप्रबंधन का एक नुकसान तो यह हो रहा है कि आम जनता दाल के लिए तरस रही है तो दूसरी तरफ उसी की गाढ़ी कमाई से एसटीसी, एमएमटीसी और नैफेड जैसी कंपनियों ने जो आयात किया है, वह पानी में जा रहा है। जाहिर है दाल की कीमतों को काबू करने में सरकारी हस्तक्षेप नाकारा साबित हुआ और वह घरेलू बाजार से भी महंगी कीमत पर दाल आयात कर महंगी दरों पर उन राज्य सरकारों को बेच रही है, जिन्होंने उस समय सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए दाल उठाने से मना कर दिया था जब उसकी दरें कम थीं।

सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों को दाल आयात करने का आदेश 2007 से दे रखा है। इसका एक अर्थ यह भी है हमारे देश में दलहन के उत्पादन की उपेक्षा का लंबा सिलसिला है, वरना भारत जैसे विशाल कृषि प्रधान देश को म्यांमार से दाल आयात करने की जरूरत क्यों पड़ती। कृषि में आय और उत्पादन बढ़ाने के लिए या तो गेहूं और चावल पर जोर दिया गया या फिर गन्ना और कपास जैसी नकदी फसलों पर। दाल भारतीय खाद्य संस्कृति का अनिवार्य अंग है यह बात कहीं विकास की तेजी में उपेक्षित रह गई। जबकि शहरीकरण बढ़ने से दाल की खपत कम होने के बजाय बढ़ती है। दरअसल दाल पैदा करने वाले नब्बे प्रतिशत इलाके असिंचित हैं। उन्हें सिंचित करने और दाल की नई प्रजातियां विकसित करने पर भी समुचित ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए धरती को नाइट्रोजन और उसके पुत्र-पुत्रियों को प्रोटीन देने वाले इस खाद्य के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम से लेकर उत्पादन नीति तक पर्याप्त ध्यान देना होगा।

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