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आफत में हिन्दू-मुस्लिम एकता ने रचा इतिहास

‘काबिलेदीद मेरे शहर के नज्जारे. जिनकी आवाज में झंकार है जंजीरों की, अपने बंदों में खुदाबंद बने बैठे हैं/ ये मेरा शहरे दिल यारा, ये मेरे शहर के लोग।’ बेबाक रचनाओं के लिए मशहूर अंतरराष्ट्रीय स्तर के चर्चित शायर फजा इब्ने फैजी होते तो, उन्हें शहर के बारे में अपनी राय बदलनी पड़ती। बेकाबू ट्रक के हादसे और पुलिस फायरिंग जैसी आफत में हिन्दू-मुस्लिम एकता ने अब रचनाकारों को नए शब्द ढूंढने पर विवश कर दिया है।

पूरे शहर से एक ही आवाज आ रही है कि प्रशासन अब हमें संभालने का एहसान दिखाना बंद कर दे। बदली तस्वीर देख जमीयत उलमा उत्तर-प्रदेश के अध्यक्ष हयातुल्लाह कासमी भी बाग-बाग हो गए, बोले ‘वाकई काबिले तारीफ हो गई यहां हिन्दू-मुस्लिम एकता। इसे पूरे मुल्क में बतौर नजीर पेश करेंगे।’ ट्रक हादसे और पुलिस फायरिंग से मिले जख्म पर दोनों समुदायों की भाईचारगी ही मरहम लगा रही है। 1969 से लेकर साल दर साल छोटे-छोटे मसले से लेकर लड़ाई-झगड़े तक यहां दोनों संप्रदायों में जहर घोलते रहे हैं। कब क्या हो जाए, इसी चिंता में पुश्तें गुजर गईं, लोग आपसी एकता और सौहार्द जैसे शब्दों को चरितार्थ होते नहीं देख पाए।

मगर बुधवार की घटना में हिन्दू-मुस्लिम एकता ने नई इबारत लिखी। आर्य समाज के प्रधान और सूत कमेटी के अध्यक्ष रामचन्द्र सिंह कहते हैं कि 70 साल उम्र बीत गई लेकिन ऐसी एकता कभी नहीं दिखी। इसी एकता और सद्भाव के चलते कारोबार पर असर नहीं पड़ रहा है। लोग दूने उत्साह से ताने-बाने की खटपट में जुट गए हैं। लोगों के बीच खास असर रखने वाले मौलवी सफीउल्लाह बोले कि अब प्रशासन हिन्दू-मुस्लिम तनाव के नाम पर बेवजह बरगलाना छोड़ दे।

अब शहर हम लोग संभाल लेंगे, शासन ट्रक हादसे से लेकर फायरिंग के लिए दोषी लोगों पर कड़ी कार्रवाई करके दिखाए। ओजैर गृहस्थ कहते हैं कि पूरा माहौल ही बदला हुआ है। ऐसा कभी भी किसी घटना के बाद हिन्दू-मुसलमानों के बीच नहीं रहा। एक अजीब सी खाईं थी, लेकिन आठ लोगों की मौत का दर्द सभी ने बांटकर एकजुटता दिखा दी। इसी का असर है कि इतना जल्दी बाजार खुलते ही देहात और दूर-दराज इलाकों के लोग बाजार में आना शुरू हो गए।

मौलवी इकबाल ने कहा कि यही एकता और आपसी विश्वास आगे बना रहा तो मऊ पूरे मुल्क में हिन्दू-मुस्लिम एकता का उदाहरण बनेगा। महेश चन्द्र आर्य उर्फ बच्च बाबू को प्रशासन से मिले दर्द के बीच एकता की मजबूत हुई कड़ी कारोबार से लेकर तरक्की के लिए सबसे बड़ी संजीवनी लग रही है।

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  • Web Title:बदल रहे हैं ‘काबिले दीद मेरे शहर के नज्जारे’