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प्रेमचंद शोध संस्थान में भैंस चर रही है घास

प्रेमचंद शोध संस्थान में भैंस चर रही है घास

यह विडंबना ही है कि उत्तर प्रदेश में दलित मुख्यमंत्री के राज में दलितों की स्थिति के बारे में अपनी साहित्यिक रचनाओं से क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बनने वाले शोध संस्थान की जमीन पर चार वर्ष बाद भी भैंस घास चर रही है और संस्थान के नाम पर एक ईंट भी अब तक नहीं जोड़ी जा सकी है।

वाराणसी से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर मिली-जुली आबादी वाले इस लमही गांव में 31 जुलाई वर्ष 1880 को हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार एवं उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म हुआ था।

प्रेमचंद्र की जन्मस्थली पर वर्ष 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को शायद तरस आया था और उन्होंने आज ही के दिन तत्कालीन केन्द्रीय संस्कृति मंत्री जयपाल रेड्डी के साथ इस महान साहित्यकार की स्मृति में अनेक योजनाओं के साथ मुंशी प्रेमचंद्र स्मारक शोध एवं अध्ययन केन्द्र स्थापित करने की घोषणा की थी, जिसके लिए केन्द्र सरकार ने तत्काल दो करोड़ रुपये जारी भी कर दिये थे। लेकिन विडंबना है कि आज तक राज्य सरकार अपने वादे के अनुरूप संस्थान के लिए न तो पूरी ढ़ाई एकड़ भूमि प्रदान कर सकी और न ही इस युगांतकारी साहित्यकार पर शोध के लिए प्रस्तावित संस्थान मूर्त रूप ले सका।

प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव ने कहा, अफसोस की बात है कि शोध संस्थान के शिलापट्ट के पीछे संस्थान के लिए ली गयी थोड़ी सी भूमि पर चार वर्ष बाद भी संस्थान के लिए एक भी ईंट नहीं रखी जा सकी है, अलबत्ता इस पर गांव की भैंसें घास जरूर चर रही हैं।

लमही में रहने वाले सेवानिवृत्त अध्यापक राममूरत मास्टर कहते हैं कि मुख्यमंत्री मायावती ने प्रेमचंद्र के लिए पिछले दो वर्षों में कुछ नहीं किया।

संस्थान के निर्माण की प्रक्रिया तेज करने के लिए वाराणसी के वर्तमान जिलाधिकारी अजय कुमार उपाध्याय ने एक समिति का गठन कर तीन जनवरी वर्ष 2009 को इसकी बैठक बुलायी थी, लेकिन उसके बाद समिति की कोई दूसरी बैठक नहीं हो सकी।

वर्ष 2005 में जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और केन्द्रीय संस्कृति मंत्री जयपाल रेड्डी यहां पहुंचे तो उन्होंने शोध संस्थान पर तत्काल काम प्रारंभ करने की घोषणा की और इसके अलावा मुंशी प्रेमचंद्र के निवास स्थान के संरक्षण, स्मारक के सौंदर्यीकरण एवं मुंशी प्रेमचंद्र सरोवर के निर्माण की आधारशिला रखी। मुलायम सिंह की पहल पर अनेक कार्य तत्काल हुए भी, लेकिन उनके बाद प्रदेश में बनी मायावती सरकार के समय में अबतक यहां की पूरी परियोजना ठंडे बस्ते में चली गयी प्रतीत होती है।

जिलाधिकारी अजय कुमार उपाध्याय ने बताया कि जिला प्रशासन ने गांव में प्रेमचंद्र शोध संस्थान के लिए ढ़ाई एकड़ जमीन लेकर इस मामले में आगे की प्रक्रिया से केन्द्र सरकार को अवगत कराने के लिए और संस्थान के लिए केन्द्र सरकार से धन लाने के लिए प्रदेश सरकार को छह माह पूर्व ही पत्र भेज दिया था।

यह पूछे जाने पर कि आखिर देरी कहां से हो रही है, लमही में प्रेमचंद्र स्मारक पुस्तकालय चला रहे सुरेश चंद्र दूबे ने कहा कि राज्य सरकार के इस मामले में कोई रुचि नहीं लेने से ही यह स्थिति बनी है।

प्रेमचंद्र साहित्य पर काम करने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा, यह बहुत ही निराशा की बात है कि हिंदी साहित्य के सबसे महान कहानीकार माने जाने वाले प्रेमचंद्र के प्रति भी देश की सरकारें इस तरह का रुख अपना रही हैं कि उनके नाम पर बनने वाले शोध संस्थान में घोषणा के चार वर्ष बाद भी भैंस घास चर रही हैं।

प्रस्तावित प्रेमचंद्र शोध संस्थान के समन्वयक एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर विजय बहादुर सिंह ने बताया कि केन्द्र सरकार की ओर से संस्कृति मंत्री जयपाल रेड्डी ने वर्ष 2005 में ही संस्थान के लिए दो करोड़ रुपये जारी करा दिये थे, लेकिन अब उस धन के भी केन्द्र सरकार को वापस किये जाने की स्थिति आ गयी है क्योंकि राज्य सरकार संस्थान के लिए आवश्यक पूरी ढाई एकड़ भूमि तक उपलब्ध नहीं करा सकी है।

जेएनयू के ही प्रोफेसर बी तलवार कहते हैं कि प्रेमचंद्र की कहानियां सदगति, दूध का दाम, ठाकुर का कुंआ, पूस की रात, गुल्ली डंडा, बड़े भाई साहब आदि सहज ही लोगों के मनमस्तिष्क पर छा जाती हैं और इनका हिंदी साहित्य में जोड़ नहीं है। उन्होंने कहा, प्रेमचंद्र से बड़ा कहानीकार हिंदी साहित्य में दूसरा कोई नहीं हुआ। दलितों की दशा पर उन्होंने ठाकुर का कुआं जैसी क्रांतिकारी कहानियां लिखीं, जिससे समाज में उनके प्रति सोच में बदलाव आया लेकिन आज स्वयं प्रेमचंद की घोर उपेक्षा हो रही है।

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