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बलूचिस्तान से क्यों डरता है पाकिस्तान

मिस्र् के शर्म-अल-शेख में जारी भारत-पाकिस्तान के संयुक्त वक्तव्य में बलूचिस्तान का ज़िक्र किए जाने पर मची हाय-तौबा संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान के बाद बिलकुल बेमानी हो गई है, क्योंकि पाकिस्तान के वजीरे-आजम युसूफ रजा गिलानी और जनरल कयानी की फौज भले ही आज इसे भारत के खिलाफ अपनी शातिर कामयाबी के तौर पर पेश कर रहे हों, उन्हें शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि ये पासा उल्टा भी पड़ सकता है। ताज्जुब तो इस बात का है कि कश्मीर मुद्दे काअंतर्राष्ट्रीयकरण करने को बेताब पाक हुक्मरान को बलूच नेता जान मोहम्मद जमाली की चेतावनी के बावजूद बांग्लादेश का सबक याद नहीं आ रहा।

बलूचिस्तान पर संसदीय बहस भटक गई है, क्योंकि मुद्दा यह नहीं है कि शर्म-अल-शेख में जारी भारत-पाक संयुक्त वक्तव्य में बलूचिस्तान का उल्लेख क्यों हुआ? जाने अनजाने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐसा कर के बलूच जनता का हित ही किया है। नस्लवादी गोराशाही राज में दक्षिण अफ्रीका और आज तिब्बत में कम्युनिस्ट चीन के जुल्मों से कई गुना अधिक नृशंसता बलूचिस्तान के स्वाधीनता प्रेमियों पर हो रही है। अपने ही नागरिकों, खासकर महिलाओं और बच्चों पर, पाकिस्तानी वायुसेना विगत छह दशकों से बमबारी कर रही है, जिसमें अब तक बीस हजार लोग मारे जा चुके हैं। इस मामले में कम्पूचिया के पोल पॉट का कीर्तिमान भी टूट गया।

बलूचिस्तान को आज़ाद करो
भारत बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अंदरूनी मसला मानता रहा है, भले ही पाकिस्तान कश्मीर का अंतर्राष्ट्रीयकरण करता आया है। इसे हम बलूच जनता के साथ भारत की कृतघ्नता ही कह सकते हैं। पाकिस्तान के सरकारी अभिलेखों के अनुसार अंग्रेजों के पलायन के पश्चात आजाद बलूचिस्तान भारतीय संघ में रहना चाहता था, जैसे कि पश्चिमोत्तर प्रांत में सीमांत गांधी के पठान अनुयायी। बलूच गांधी, और स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल समद खान अचकजाई के नेतृत्व में बलूच सत्याग्रही महात्मा गांधी के आंदोलन में भी सक्रिय रहे थे। लेकिन न केवल भौगोलिक दूरी के कारण, बल्कि सत्ता प्राप्ति के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं की जल्दबाजी की वजह से बलूचिस्तान भारत से कट गया।
तब भारत से नाउम्मीद होकर ही बलूच जनता ने पाकिस्तान के विरुद्घ अपनी स्वतंत्रता का संघर्ष शुरू कर दिया। जवाब में मोहम्मद अली जिन्ना ने थल और वायुसेना भेजकर (27 मार्च 1948) राजधानी क्वेटा पर कब्जा कर लिया। रियासतों के सारे नवाबों, खासकर कलाट के नवाब मीर अहमद यार खान ने, जिन्ना के विलय प्रस्ताव पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया था। स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना इस दमन प्रक्रिया का दिग्दर्शन करने क्वेटा गये। मगर गंभीर रूप से वहाँ बीमार पड़ गये और कराची लौट आये। उसी हफ्ते उनका निधन हो गया। इसके बाद बलूच विद्रोह पाकिस्तान वायुसेना ने कुचल दिया।

बांग्लादेश की मिसाल
उसी समय उधर कश्मीर घाटी के जननायक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और डोगरा महाराजा हरि सिंह (सांसद कर्ण सिंह के पिता) ने संधि पर हस्ताक्षर कर अपनी रियासत का विलय भारत में कर दिया था। भौगोलिक विडम्बना है कि स्वेच्छा से भारतीय संघ में आया कश्मीर तीन बार पाकिस्तानी सेना की हार के बाद भी विश्व मंच पर विवाद के रूप में उठता रहा, जबकि निरंतर नरसंहार के बावजूदबलूचिस्तान की आजादी और मानवाधिकार का मसला दबा ही रह गया। इसीलिए भारतीय प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करते हुए कलाट रियासत के युवा नवाब तथा उत्तराधिकारी और निर्वासित नेता खान सुलेमान खान ने लंदन में जारी अपने बयान (22 जुलाई 2009) में आशा प्रकट की कि सरदार मनमोहन सिंह के कारण अब बलूचिस्तान में लोकतंत्र और स्वशासन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप होगा। दूसरे निर्वासित नेता खान वाहिद बलोच उत्तरी अमरीकी बलूच संघ के सदर हैं। उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर मांग की कि अब भारत को पाकिस्तानी फौज के अमानुषिक कृत्यों को पूरी दुनिया की नजर में ला देना चाहिए।
वाहिद बलोच ने अमरीकी मीडिया के मार्फत दो मांगें भारत सरकार के समक्ष रखी है: पहली तो यही कि देर से सही, अब अहिंसावादी भारत इंसानियत के नाम पर बलूच मजलूमों का साथ दे। और दूसरी, ये कि भारत ऐतिहासिक बोलन दर्रे (जहाँ से विदेशी लोग भारत प्रवेश करते रहे) से सटे बलूचिस्तान की वैसे ही मदद करे, जैसे उसने पंजाबी-शासित पश्चिमी पाकिस्तानी तानाशाहों के विरुद्घ बंगभाषी पूर्वीपाकिस्तानियों की सहायता की थी।
ज़ाहिर है, आम बलूच पठान इंदिरा गांधी का निश्छल प्रशंसक है, क्योंकि उन्होंने पूरब के मुसलमानों को आजादी दिलाई थी। माना कि मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सोच और काम से इंदिरा गांधी और वल्लभभाई पटेल जैसा करने में हिचकेंगे, मगर वे पाकिस्तान के अधूरे झूठ में छेद तो कर ही सकते हैं।
 
गिलानी की हिमाकत और कड़वे सच
अचंभा इस बात का है कि पड़ोसी बलूचिस्तान की त्रासदी पर भारत की निन्दनीय खामोशी के बावजूद, युसूफ गिलानी भारत को अकारण परामर्श दे रहे हैं कि वह बलूचिस्तान में हस्तक्षेप बंद कर दे। पाकिस्तान के सांसद, बलूच जननायक और सीनेट (राज्यसभा) के उपाध्यक्ष जान मोहम्मद जमाली ने (18 जून 2008) चेतावनी देते हुए ये अप्रिय सच संसद को बता दिया था कि प्रान्तीय स्वायत्तता नहींमिली, तो सारा बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाएगा। इसलिए फौरन संविधान में संशोधन कर बलूच जनता को स्वायत्तता के हक दिये जाएं। कोई अन्य विकल्प बचा नहीं है। गिलानी-जरदारी के लिये अप्रिय सच यह भी है कि उनका हुक्मनामा आज बलूचिस्तान में कहीं भी नहीं चलता। ब्रिटिश राज के समय ही वहाँ विप्लव की चिंगारी उठ गई थी। उपेक्षा और हिंसा के जरिए पश्चिम पंजाबी शासकों नेइसे गृहयुद्घ की कगार पर ला दिया। अब तक पांच बार केन्द्रीय शासन तथा बलूच विद्रोहियों से सीधी जंग हो चुकी है। कश्मीर के संदर्भ में बलूचिस्तान को देखकर यकीन हो जाता है कि भारत भूगोल से हार गया। हमारे वार्षिक राष्ट्रीय बजट से कश्मीर की सुरक्षा और विकास के लिए अरबों रुपये खर्च होते हैं। सीमापार आतंकवाद के कारण राजकोष पर सालाना भार बढ़ता जा रहा है। मगर पाकिस्तानबलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर अरबों डालर कमा रहा है। यह क्षेत्र देश का फल उद्यानकहलाता है। पाकिस्तान के उपभोक्ताओं को पचास वर्षों से यहां के सूयी इलाके से प्राकृतिक गैस मिलती रही है, मगर स्थानीय जनता को ये कुछ ही अरसे से मुहैया की जा रही है। शिक्षा का आलम यह है कि महिला साक्षरता बासठ वर्ष बाद भी केवल एक प्रतिशत है। पूरे पाकिस्तानी साक्षरता प्रतिशत मेंबलूचिस्तान निम्नतम है। यहां यूरेनियम, सोना और तेल का भण्डार है, मगर यात्रियों को राजमार्गों पर चिलचिलाती धूप से केवल बिजली के खम्भों से ही छाया प्राप्त होती है। यहां के कालीन निर्माता पड़ोस के तुर्कमान गणराज्य में बस गये, क्योंकि यहाँ उन्हें प्रगति का मौका नहीं मिला। ढाका की मशहूर मलमल की तरह, बलूची कालीन भी विश्वविख्यात रहे हैं।

चालाक चीन से खबरदार 
इस्लामी जम्हूरिया का सर्वाधिक उपेक्षित प्रान्त बलूचिस्तान अब धीरे-धीरे पाकिस्तानी सरकार के मूक समर्थन से कम्युनिस्ट चीन के उपनिवेश के रूप में उभर रहा है। हवेलियाँ- काशगर रेल लाइन कानिर्माण करके पाकिस्तान यहां से चीन को अपने इस्लामी इलाके शिंजिंयांग के उइगर मुसलमानों को दबाने के लिये इस्तेमाल करने की छूट दे रहा है। उधर चीन अब ग्वादर बन्दरगाह का निर्माण कर रहा है ताकि भारत, बर्मा और मध्येशियाई गणराज्यों को आर्थिक रूप से घेरा जा सके। इसलिए भारत-पाक रिश्तों के विश्लेषण के समय हमें याद रखना होगा कि केवल भारतीय कश्मीर पर चीन अधिकृत क्षेत्र में कराकोरम पाक-चीन राजमार्ग पर चिन्ता व्यक्त करने से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। ग्वादर बंदरगाह पर चीनी नौसेना के नियंत्रण से भी बलूचिस्तान के भूभाग से वे भारत पर शिकंजा कस रहे हैं।भारत पहले ही कश्मीर, बर्मा, श्रीलंका, पूर्वोत्तर राज्यों तथा बांग्लादेश में बढ़ते चीनी प्रभाव से तंग रहता आ रहा है। अब बलूचिस्तान का नया मोर्चा खुल रहा है। सांसदों को इस पर बहस करनी चाहिए।

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