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दोस्ती पर हावी हो गई आधुनिकता

-फैशन के दौर में बदल चुके हैं दोस्ती के मायने
-फ्रेंडशिप के नाम पर निभाई जा रही है औपचारिकता
-आधुनिकता में लोग भूलते जा रहे हैं दोस्ती का मतलब


21सदी के इस दौर में दोस्ती पर भी आधुनिकता हावी हो गई है। दोस्ती जैसा पवित्र बंधन अब सिर्फ फ्रेंडशिप डे तक ही सिमट कर रह गया है। पहले जहां लोग मित्रता के नाम पर अपनी जान तक न्योछावर कर देते थे। आज उसके मायने बदल गए है। मॉल्स व बाजारों में बिक रहे तरह-तरह के गिफ्ट दोस्तों को देकर सिर्फ औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं।


पुराने समय की बात करें तो मित्र को जीवन का अहं हिस्सा माना जाता था। इस पवित्र बंधन को लोग जिन्दगी भर निभाने की कसमें खाते थे। मित्र को गुप्त से भी गुप्त बात जानने का पूरा अधिकार था। महिलाएं भी बड़े ही पारंपरिक तरीके से अपनी सहेलियां बनाती थी। काफी रश्मों-रिवाज के साथ उनका आपस में जुड़ाव होता था। वह एक दूसरे को उपहार देती थीं। जूठे पान व मिठाइयां खिलाकर एक दूसरे के लिए जीने मरने की कसमें खाई जाती थीं। गावों में कहीं-कहीं आज भी यह परंपरा कायम है। पौराणिक कथाओं में भी मित्रता का अलग ही रूप दिखाई देता है। सूर्यनगर में रहने वाले जाने माने पंजाबी लेखक कृपाल सिंह आजाद बताते हैं कि आज भागदौड़ की जिंदगी में दोस्त का मतलब लोग भूलते जा रहे हैं। खुद को आगे बढ़ाने की महात्वकांक्षा ने लोगों को स्वार्थी बना दिया है। मॉल्स, कॉर्नर व गैलरियों में तरह-तरह गिफ्टों की चकाचौंध। खरीदने के लिए जुटी युवक-युवतियों की भीड़। देखकर यही लगता है कि अब दोस्त सिर्फ एक खास दिन के लिए बन कर रह गए हैं। जिन्हे कुछ गिफ्ट देकर दोस्ती का आगाज किया जाता है। ऐसे में बाजार भी पूरी तरह से से हावी है। वसुंधरा निवासी रिटायर्ड शिक्षिका सुमित्र मिश्रा का मानना है कि अब लोग अपनी सभ्यता और संस्कृ ति को भूलते जा रहे हैं। दोस्त या मित्र का कोई खास दिन नहीं होता है। यह जीवन भर का रिश्ता है। लेकिन आधुनिकता व पश्चिमी सभ्यता ने इसे फ्रेंडशिप डे बना दिया है।

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