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‘हमारी गलती नहीं, पाक खुद फंस गया’

आपकी राय में शर्म-अल-शेख में भारत-पाक साझा बयान में बलूचिस्तान का संदर्भ कैसे आया होगा?
ये मसला पकिस्तान के मतलब का ही है। उसने ही इसे उठाया और साझा बयान में भारत ने इसे सिर्फ पाकिस्तान की वजह से ही जगह मिलने दी। पाकिस्तान की हुकूमत और समाज में भी इसको लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। उसके प्रधानमंत्री यूसुफ गिलानी ने कैफियत दी होगी कि हमने भी कुछ हासिल कर लिया है। जबकि हमारे प्रधानमंत्री ने सोचा होगा कि अगर गिलानी इस ‘मीठी गोली’ से ही खुश हो रहे हैं, तो चलो मान लेते हैं।

क्या आप मानती हैं कि ऐसा करके भारत ने कोई ब्लंडर यानी भयंकर गलती कर दी है?
शुरू में तो मैं इससे भौंचक्की रह गई। लेकिन बाद में जब साझा बयान फिर से पढ़ा, तो इसका कुछ मतलब निकल कर आया। मैं नहीं समझती कि हमने गलती की है। पाकिस्तान ने एक घरेलू समस्या को अंतर्राष्ट्रीय शक्ल दे दी है- पाकिस्तान का विपक्ष और कट्टरवादी जल्दी ही समझ जाएंगे कि भारत अब इस मुद्दे को हर कहीं उठा सकेगा। बलूच अवाम पाक के हवाई हमले झेलती रही है, लेकिन अब तक बाहरी मुल्क इसका नोटिस ही नहीं ले रहे थे। संसद में बलूच नुमाइंदगी बहुत कम है, और कोई इस पर बोलता नहीं। अब, जबकि पाकिस्तान ने इस मसले को फोकस में ला ही दिया है, तो हम ही इसे दोतरफा मानकर क्यों चलें? मैं नहीं जानती कि भारतीय राजनयिक इसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाने की छूट ले पाएंगे या नहीं, लेकिन हम इसे मानवाधिकार आयोग जैसे मंचों पर तो उठा ही सकते हैं।
हां, पाक वजीरे आजम गिलानी के लिए ये जरूर मीठी गोली है, जिसे पाकर वे अपने मुल्क को  खुशी से झूम-झूम कर बता सकते हैं कि देखो, मैंने भारत के सामने बलूचिस्तान का मसला उठा दिया। इधर हमारे प्रधानमंत्री ने भी यही सोचा होगा कि मैं भी दिल्ली लौटकर इसे भुनाने में कामयाब हो जाऊंगा। लेकिन कमी इतनी ही है कि मनमोहन सिंह विपक्ष से खुलकर विमर्श नहीं करते।
मेरी राय में साझा बयान में बलूचिस्तान का जिक्र करने में कोई बुराई नहीं है। 2006 में जब नवाब अकबर खान बुगती की हत्या हुई थी, तो हमारे विदेश मंत्रालय ने कड़ा बयान जारी करके उन्हें दरकिनार किए जाने और हत्या की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठाये थे। तब पाकिस्तान ने इसकी भर्त्सना करते हुए भारत पर उसके आंतरिक मामलों में दखल का आरोप लगाया था। और अब, जब वह खुद ही इस ‘आंतरिक’ मामले को ‘बाहरी’ बनाकर इसका अंतर्राष्ट्रीयकरण करना चाहता है, तो हम भी इसे अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या जहां चाहें, वहां ले जा सकते हैं।
मैं विश्वास के साथ कहती हूं कि उन्हें खुद ही समझ में आ जाएगा कि वे विश्व बिरादरी की निगाह में आकर फंस गए हैं, और अब पीछे हटने में ही भलाई है। तब वे इस संदर्भ को निकालने के लिए बेताब हो जाएंगे।

पाकिस्तान असल में भारत पर बलूचिस्तान में क्या करने का इल्जाम लगा रहा है?
पाकिस्तान केवल ये कह रहा है कि भारत बलूचिस्तान में ‘दखल’ कर रहा है, या जैसा कि जनरलकयानी कहते हैं भारत वहां अपनी ‘टांग अड़ा’ रहा है। यहां तक कि अमेरिका के अफ-पाक विशेष दूत रिचर्ड होलब्रूक भी कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में भारत की कथित गुप्त गतिविधियों के कोई सबूत नहीं दिए हैं।
रैंड कॉर्पोरेशन की फैलो क्रिस्टीन फेयर के मुताबिक उन्होंने जहेदान में भारतीय कौंसुलेट का दौरा किया है। उनका दावा है कि भारत वहां से कोई वीजा तो जारी नहीं करता, लेकिन बलूच असंतोष को हवा देने के लिए पैसा पहुंचा रहा है। पाकिस्तान ऐसी स्क्रैप सूचनाओं को ही सबूत के तौर पर गिनवा रहा है। लेकिन असलियत ये है कि जहेदान में भारत का कोई कौंसुलेट है ही नहीं। पाकिस्तान ये भी कहता है कि कंधार के भारतीय कौंसुलेट से भी बलूच उग्रवादियों को पैसा मिलता है। लेकिन मैं नहीं मानती कि भारत वहां कुछ भी कर रहा है।
नब्बे के दशक में इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्री रहते ये नीतिगत फैसला किया गया था कि पाकिस्तान में ऐसे तमाम दखल को बंद कर संबंधित गुप्त सेल्स को भंग कर दिया जाए। उसके बाद से न तो एनडीए और न ही यूपीए की सरकार ने वैसा ‘दखल’ फिर से शुरू किया है।

साक्षात्कार: नीलोवा रॉयचौधुरी

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