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शहर के निर्माण पर हजार कायदे, गांवों में एक भी नहीं

शहर के सेक्टरों में भवन निर्माण के लिए बने हजार नियम कायदे लाल डोरा की सीमा के अंदर बेमायने हो जाते हैं। गांव में भवन नियमों को ताक पर रखकर हो रहे निर्माण पर किसी का नियंत्रण नहीं है। चाहे बीस फुट गहरी खुदाई करके भवन बन रहा हो, या चार मंजिला इमारत खड़ी की जा रही है। आवासीय बिल्डिंग खड़ी हो रही हो, या व्यवसायिक। गांव के विकास के लिए जिम्मेदार अथॉरिटी में ग्रामीण इलाकों में भवन निर्माण के लिए कोई नियमावली नहीं बनी है। इस वजह से गांव में बेधड़क निर्माण हो रहे हैं। भूकंप संभावित क्षेत्र होने के बावजूद भवनों के निर्माण पर नियंत्रण न होना सरकारी महकमों की लापरवाही उजागर करता है।


हालांकि भवन नियमों को ताक पर रख कर निर्माण के कारण हुए बिशनपुरा गांव में हादसे के बाद अथॉरिटी में भी इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है, कि गांवों में संसाधन मुहैया कराने का जिम्मेदार होने के बावजूद इन गांवों में हो रहे कंस्ट्रक्शंस पर नियंत्रण क्यों नहीं हो सकता? बिजली, पानी, सड़क, सीवर समेत सभी सुविधाएं मुहैया कराने के बाद भी अथॉरिटी के पास गांवों में भवन व पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर हो रहे निर्माण पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं है। इस मुद्दे पर एसीईओ आर पी अरोड़ा ने बिल्डिंग व नियोजन के अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में इस बात पर चर्चा की गई।


अथॉरिटी का मत है कि भवन नियमावली सिर्फ सेक्टरों व पांच प्रतिशत आबादी की जमीन पर ही लाग ही लागू होती है। लाल डोरा के अंतर्गत जमीन पर किसी तरह के निर्माण पर नियंत्रण का अधिकार नहीं है। ऐसे में अथॉरिटी बिशनपुरा हादसे में किसी तरह की कार्रवाई नहीं कर सकती। हालांकि इस मुद्दे पर सीईओ स्तर पर बातचीत की जाएगी।

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