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शिक्षा का अधिकार छीनने वाला बिल

पिछले हफ्ते जब राज्यसभा ने तथाकथित ‘शिक्षा का अधिकार विधेयक, 2008‘ को पारित किया, तब वहां पर 250 सदस्यों में से मात्र 54 मौजूद थे। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि हमारे नीतिनिर्माता इस ऐतिहासिक विधेयक को कितनी प्राथमिकता देते हैं। इससे भी कहीं ज्यादा चिंताजनक बात है कि मानव संसान विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कितनी आसानी से विधेयक को ध्वनिमत से पारित करने हेतु सदस्यों को राजी कर लिया।

कई सदस्यों ने चिंता जाहिर की कि छह साल से कम उम्र के 17 करोड़ से अधिक बच्चों को संविधान में निहित संतुलित आहार, स्वास्थ्य और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के मौलिक अधिकार से बाहर कर दिया गयाहै। सिब्बल का कुतर्क था कि यह विधेयक 86वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के जरिए खंड तीन में डाले गए अनुच्छेद 21(क) के तहत लाया गया है, जिसने सरकार की जवाबदेही को 6-14 आयु समूह में सीमित कर दिया है। अचरज तो यह है कि किसी भी सदस्य ने नहीं कहा कि अनुच्छेद 21(क) स्वयं ही संविधान के मूल अनुच्छेद 45 के शिथिलीकरण का परिणाम है, जिसमें छह साल से कम आयु के बच्चे शामिल रहे हैं। इस तथ्य की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने उन्नीकृष्णन फैसले (1993) में की थी, जो आज भी लागू है, चूंकि अनुच्छेद 21(क) अभी तक अधिसूचित नहीं हुआ है और इसके संसद में पारित होने व अधिसूचित होने के बाद भी लागू रहेगा।

राज्यसभा में विधेयक में पड़ोस की परिभाषा गायब होने का मुद्दा भी उठाया गया। सच्चाई तो यह है कि विधेयक ने दुनियाभर में मानी गई पड़ोसी स्कूल की उस अवधारणा को भ्रमित किया है, जिसे कोठारी आयोग (1966) ने पेश किया था और जो अमेरिका और कनाडा जैसे कई पूंजीवादी मुल्कों में लागू है। इसके अनुसार हरेक स्कूल का एक पूर्वनिर्धारित पड़ोस होगा, जिसमें रहने वाले सभी बच्चे अपने पड़ोसी स्कूल में बगैर किसी भेदभाव के पढ़ पाएंगे। लेकिन विधेयक के अनुसार पड़ोस बच्चे का होगा, न कि स्कूल का! इस तब्दीली के मायने हैं कि जिस बहुपरती भेदभावपूर्ण स्कूल व्यवस्था का विधेयकवैधानीकरण करने जा रहा है उसमें गरीब बच्चों को घटिया दर्जे के स्कूलों में पढ़ने के लिए मजबूर किया जा सकेगा, जबकि मध्यमवर्ग और अभिजात तबके के बच्चों को केंद्रीय विद्यालय या निजी स्कूलों में पढ़ने के अवसर पूर्ववत उपलब्ध रहेंगे। सिब्बल ने विधेयक के इस घपले से सदस्यों का ध्यान विकर्षित करने के लिए कह दिया कि इस संबंध में राज्य सरकारें नियम बनाएंगी। आखिरकार, राज्य सरकारें पड़ोसी स्कूल को लागू करने के लिए नियम कैसे बनाएंगी, जबकि इसकी अवधारणा विधेयक में ही मौजूद नहीं है?
 
कुछ सदस्यों ने सवाल उठाया कि विधेयक में इसके क्रियान्वयन हेतु कोई वित्तीय अनुमान नहीं है।सिब्बल का जवाब था कि एक समूह इस अनुमान की तैयारी में लगा हुआ है। जब विधेयककानून बन जाएगा तब हम अतिरिक्त संसाधनों की मांग पेश करेंगे। विडंबना यह है कि इस उत्तर सेसदस्य संतुष्ट हो गए। क्या हम कानून में सरकार द्वारा पर्याप्त धनराशि मुहैया कराने की संवैधानिक गारंटी मांग रहे हैं या फिर महज सरकारी मौखिक आश्वासन? हकीकत यह है कि फरवरी 2008 में योजनाआयोग की विधिवत स्वीकृति के बाद मंत्रालय ने मंत्रीमंडलीय सचिवालय को इस बाबत अगले सात साल में रु़ 2.28 लाख करोड़ के अतिरिक्त खर्च का वित्तीय अनुमान भेजा था। तो फिर विधेयक के वित्तीय ज्ञापन में यह क्यों लिखा है कि, आज इस बाबत वित्तीय आवश्यकताओं का हिसाब लगाना मुमकिन नहीं है?

क्या विधेयक में स्कूलों के लिए दिए गए मानदंड सरकारी स्कूलों के हालात बेहतर बनाने में मददगार होंगे? स्कूलों के नामांकन आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट है कि लगभग दो-तिहाई सरकारी प्राथमिक स्कूलघटिया दर्जे की श्रेणी में बने रहेंगे, चूंकि उनके लिए महज दो कक्ष व दो शिक्षक या तीन कक्ष व तीन शिक्षक जैसी कमतर सुविधाओं का ही प्रावधान है। इन कमरों में से भी एक कमरा मध्यान्ह भोजन केलिए भंडारगृह के काम में लिया जाएगा, चूंकि मानदंडों में केवल रसोई का प्रावधान है, स्टोर का नहीं। इसके साथ हम विधेयक के उस प्रावधान पर नज़र डालें, जो कहता है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को जनगणना, चुनाव (पंचायतों से लेकर संसद तक) और आपदा राहत जैसी अपरिभाषित श्रेणी के कामों में पूर्ववत लगाया जाता रहेगा। यानी एक शिक्षक द्वारा एक ही कक्ष में एक से अधिक कक्षाओं कोपढ़ानेवाली बीमारी का प्रकोप और बढ़ जाना तय है जिसके चलते शिक्षण की गुणवत्ता का स्तर गिरेगा। विधेयक के खंड 27 में शिक्षकों से गैर-शैक्षिक उद्देश्यों से कोई काम नहीं लेने का प्रावधान है। लेकिन शब्दों के चयन में चतुराई के साथ कानूनी गुंजाइश रख ली गयी है कि शिक्षकों से पढ़ाने के अलावा अन्य काम पूर्ववत लिए जाते रहेंगे। इसके अलावा कम-से-कम 75 फीसदी सरकारी स्कूलों का प्रबंधन बेहतर होने की कोई उम्मीद नहीं है, चूंकि उनके नामांकन के आधार पर विधेयक में अलग से प्रधानपाठक का कोई प्रावधान नहीं है।

विधेयक के अनुसार मिडिल (कक्षा 6-8) स्कूलों में विद्यार्थी : शिक्षक अनुपात 1:35 रखा जाएगा, जबकि आज अधिकांश मिडिल स्कूलों में औसत विद्यार्थी : शिक्षक अनुपात 1:34 से 1:29 के बीच में है यानी विधेयक में दिए गए मानदंड से बेहतर है। कुल मिलाकर विधेयक सरकारी स्कूली व्यवस्था को घटियादर्जे के शिक्षण और शिक्षकों की कमी की बुनियादी समस्याओं से उबार पाने में सक्षम नहीं है। केवल एक अंतर होगा - स्कूली व्यवस्था की वर्तमान बदहाली वैधानीकृत हो जाएगी। इसी वैधानीकरण के लिएअनुच्छेद 21(क) में यह शर्त डाली गई है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उस रीति से दी जाएगी जो राज्य कानूनन निर्धारित करेगा।

विधेयक के तीन स्पष्ट मकसद हैं। पहला, सरकार को सभी बच्चों को समतामूलक गुणवत्ता की शिक्षा मुहैया कराने की संवैधानिक जवाबदेही से बरी करना। दूसरा, केंद्रीय या नवोदय विद्यालयों, 11वीं योजना में प्रस्तावित 6,000 मॉडल स्कूलों या ऐसी अन्य अभिजात् श्रेणियों के स्कूलों को छोड़कर शेष सारीसरकारी स्कूल व्यवस्था को ध्वस्त करना। तीसरा, सार्वजनिक-निजी साझेदारी, वाउचर स्कूल या निजी ऐजेंसियों द्वारा सरकारी स्कूलों को गोद लेना, जैसी नई स्कीमों के जरिए स्कूली शिक्षा के निजीकरण औरबाजारीकरण की रफ्तार को तेज करना। विधेयक की इस चौंकाने वाली तस्वीर के बारे में यदि कोईशक है तो सिब्बल साहब के सौ-दिनी एजेंडे को ध्यान से पढ़ लें या फिर 20 जुलाई को राज्यसभा में विधेयक पर उनके भाषण के इस कथन पर ध्यान दें कि सरकार के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाले स्कूल खोल सके। 

लेखक प्रसिद्ध शिक्षाविद हैं
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