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कर्नाटक: देवगौड़ा परिवार को एक और शिकस्त

जनता दल और देवगौड़ा परिवार को उस समय एक बड़ा झटका लगा, जब कर्नाटक मिल्क फेडरेशन यानी केएमएफ पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा के बड़े बेटे एच. डी. रेवन्ना के हाथ से निकल गई। रेवन्ना पिछले 12 साल से फेडरेशनल के अध्यक्ष थे और देश की सबसे बेहतर मिल्क कोऑपरेटिव बनाने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका मानी जाती है।

केएमएफ देश की तीसरी सबसे बड़ी डेयरी कोऑपरेटिव और दक्षिण भारत की सबसे बड़ी कोऑपरेटिव है।
फेडरेशन को गौड़ा परिवार से हथिया लेना भाजपा और खासकर राज्य के मशहूर रेड्डी बंधुओं की एक बड़ी जीत है। तीन साल पहले रेड्डी बंधुओं ने मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी और उनके परिवार पर बेलारी खनन सौदे में 150 करोड़ रुपए की घूस लेने का आरोप लगाया था। हालांकि इस मामले का कुछ हुआ नहीं, लेकिन तबसे दोनों परिवारों में आरोप-प्रत्यारोप एक नियमित कर्म की तरह हो गए हैं।
भाजपा की नजर इस फेडरेशन और उससे जुड़े बीस लाख किसानों पर लगी हुई थी। फेडरेशन से रेवन्ना के एकाधिकार को चुनौती देने का पहला कदम भाजपा ने तभी उठा दिया था जब उसने पार्टी की दुग्ध उत्पादन सेल का गठन किया था। इस साल जनवरी में सेल का गठन करने के तुरंत बाद पार्टी की येदयुरप्पा सरकार ने विधानसभा उपचुनाव में जीत दर्ज करा के भाजपा ने 224 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत भी हासिल कर लिया था।

सेल बनाते ही यह भी साफ हो गया था कि मकसद है फेडरेशन में घुसपैठ बनाना और इस पर से जनता दल (एस) के नियंत्रण को तोड़ना। भाजपा की परेशानी का कारण यह था कि रेवन्ना साल दर साल इसका चुनाव भारी अंतर से जीत रहे थे। पिछले साल मई में जब से राज्य में भाजपा की सरकार बनी है, वह दूध की कीमत को लेकर लगातार फेडरेशन से उलझी हुई है। दूध के लिए किसानों को दी जानी वाली कीमत को लेकर भी विवाद रहा है।

पिछले साल अगस्त में फेडरेशन अध्यक्ष के तौर पर रेवन्ना ने घाटा कम करने और किसानों को दीजाने वाली कीमत बढ़ाने के लिए दूध के दाम में दो रुपये प्रति किलो की बढ़ोत्तरी कर दी थी। लेकिन राज्य सरकार के निर्देश के बाद फेडरेशन को यह मूल्यवृद्धि वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था। रेवन्ना ने इसके बाद सरकार पर हल्ला बोल दिया था, उनका आरोप था कि सरकार डेयरी किसानों के हालातको नजरंदाज कर रही है। इसके जवाब में भाजपा सरकार ने डेयरी किसानों को नगद प्रोत्साहन देने की योजना शुरू कर दी। इस योजना से सरकार ने ग्रामीण स्तर पर सहकारी समितियों को पैसा दिया, जिससे भाजपा फेडरेशन और रेवन्ना को दरकिनार करने में कामयाब रही।

जून में हुए विभिन्न मिल्क यूनियनों के चुनाव से ही यह साफ हो गया था कि फेडरेशन में भाजपा का रुतबा बढ़ गया है। 13 जिलों की यूनियन में भाजपा ने दस पर कब्जा कर लिया और मिल्क फेडरेशन के अध्यक्ष पद के लिए पार्टी के विधायक सोमशेखर रेड्डी का नाम पेश कर दिया। इस पद का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार को राज्य के किसी मिल्क यूनियन का निदेशक होना चाहिए। रेड्डी बेलारी के श्रीधारगेड्डे प्राइमरी मिल्क प्रोडय़ूसर कोऑपरेटिव एसोसिएशन के सदस्य थे। और यह पूरी तरह तय हो गया था कि उन्हें सरकार द्वारा मनोनीत तीनो निदेशकों के भी वोट मिलेंगे, इससे उनके चुने जाने को लेकर कोई शक नहीं रह गया था। इन हालात को देखते हुए रेवन्ना ने अपना पर्चा दाखिल ही नहीं किया और रेड्डी निर्विरोध निर्वाचित हो गए।

हालांकि निर्विरोध निर्वाचन के साथ ही यह सुखद कहानी यहीं पर समाप्त नहीं हो गई। भाजपा ने भले ही मिल्क फेडरेशन से रेवन्ना और गौड़ा परिवार का कब्जा खत्म कर दिया हो, लेकिन इससे पार्टी के भीतर भी असंतोष दिखाई देने लगा। पार्टी नेताओं का एक तबका इतनी महत्वपूर्ण जगह को रेड्डी बंधुओं के हवाले करने से नाराज है। यह भी कहा जाता है कि पार्टी के ज्यादातर नेता रेड्डी को उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में थे। लेकिन पार्टी विधायक दल में रेड्डी बंधुओं का जो दबदबा है, उसके चलते वे इस पद को हासिल करने में कामयाब रहे।

यह भी सच है कि जब सोमशेखर रेड्डी ने कर्नाटक मिल्क फेडरेशन के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया तो उस मौके पर राज्य पार्टी अध्यक्ष डी वी सदानंद गौड़ा, परिवहन मंत्री आर. अशोक, सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सवादी के अलावा भाजपा के करीब बीस विधायक वहां मौजूद थे। यह तथ्य एक साथ दो बातेंबताता है- एक तो कर्नाटक मिल्क फेडरेशन राजनैतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण है और दूसरे राज्य में रेड्डी बंधुओं का रुतबा कितना ज्यादा है। 

radhaviswanath73@yahoo.co.in
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं
 

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