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बयान और बवंडर

बेशक शर्म अल शेख में भारत और पाकिस्तान का जो साझा बयान जारी हुआ उसमें बलूचिस्तान का उल्लेख अचंभे में डालता है। इससे कोई आसमान नहीं टूटा, लेकिन यह विवाद का एक ऐसा क्षेत्र जरूर खोल गया, जिससे बचा जाना चाहिए था। इसका इस्तेमाल पाकिस्तान सरकार और वहां की कईं ताकते अपने ढंग से कर सकती हैं, और ऐसी कोशिशें शुरू भी हो गई हैं। पाकिस्तान के एक प्रमुख अखबार ने तो यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान ने शर्म अल शेख में भारत को एक दस्तावेज देकर यह बताया है कि पाकिस्तान की आतंकवादी वारदात में भारत की क्या भूमिका रही है। अखबार के अनुसार श्रीलंकाई क्रिकेट खिलाड़ियों पर हमले में भारत के हाथ का जिक्र भी इस दस्तावेज में था। बाद में पता पड़ा कि ऐसा कोई दस्तावेज अस्तित्व में ही नहीं है। साझा बयान ने भारत की विदेश नीति को शायद उतना नुकसान नहीं पहुंचाया जितना कि इस बयान के बाद होने वाली इस तरह की भ्रामक बयानबाजी पहुंचा रही है। देश की संसद में खड़े होकर जब सांसद यह कहते हैं कि सरकार ने विदेश नीति पर राष्ट्रीय सर्वसम्मति का उल्लंघन किया है या संसद के बाहर जब यहां तक कहा जाने लगता है कि सरकार ने देश को बेच दिया है तो सरकार बेवजह कठघरे में खड़ी होती है और फिर इससे विदेश-नीति की धार भी कुंद होती है। वह भी भारत-पाकिस्तान संबंधों जैसे संवेदनशील मसलों पर। अलबत्ता यह पहला मौका नहीं है, ऐसा ही विवाद भारत अमेरिका परमाणु समझोते के मसले पर भी उठाया गया था।

हमारी धारणा यही रही है कि वह विदेश नीति किसी राजनैतिक दल की नहीं होती, वह देश की होती है। लेकिन विदेश नीति को चलाने का जिम्मा सरकार का और आखिर में सत्ताधारी दल का होता है। लेकिन सिर्फ इसीलिए राजनीति की वजह से प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करना आखिर में सभी के लिए हानिकारक होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को लोकसभा में जो बयान दिया वह इसी लिहाज से महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांति के लिए पाकिस्तान द्वारा तमाम रार के बावजूद उससे बातचीत की जो नीति अटल विहारी वाजपेयी के समय शुरू हुई थी वह आज भी जारी है। अगर कारगिल के बाद आगरा शिखर वार्ता गलत नहीं थी तो मुंबई की आतंकवादी वारदात के बाद शर्म अल शेख की पहल कैसे गलत हो गई? दोनों ही मौकों पर हम इसी नतीजे पर पहुंचे थे कि बातचीत का कोई विकल्प नहीं है। इसके अलावा राष्ट्रीय सर्वसम्मति और क्या होती है।

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