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अभिव्यक्ति का डंक

बीएमडब्ल्यू हादसे के मुख्य अभियुक्त की सजा कम किए जाने का फैसला भले लोगों के गले न उतरा हो पर इस मुकदमे के दूसरे हिस्से में सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के आचरण और मीडिया की कार्यप्रणाली पर जिस तरह की सुचिंतित टिप्पणियां की हैं, वे लंबे समय तक राह दिखाने वाली हैं। वरिष्ठ वकील आरके आनंद की सजा बरकरार रखते हुए अदालत ने एक तरफ बार को गरिमापूर्ण आचरण करने की हिदायत दी है, तो उनके बारे में किए गए स्टिंग ऑपरेशन पर भरोसा करते हुए अच्छे और बुरे स्टिंग का फर्क भी बताया है। यह फैसला जहां इस बात पर चिंता जताता है कि वकीलों की आचारसंहिता के बारे में विधिवत कानून और बार कौंसिंल ऑफ इंडिया जैसी संस्था के होते हुए भी उनके चरित्र में चिंताजनक गिरावट आती जा रही है, वहीं मीडिया पर किसी तरह की आचार संहिता थोपे जाने के भी खिलाफ राय देता है। उसकी चिंता न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और पारदर्शिता तो है ही साथ ही मीडिया की स्वायत्तता भी। तभी अदालत इस दलील से असहमति जताता है कि मीडिया को कोर्ट से अनुमति लेकर स्टिंग ऑपरेशन करना चाहिए। इसे वह दोनों संस्थाओं की स्वायत्तता और गरिमा के प्रतिकूल मानती है। लेकिन उससे भी बड़ी बात अदालत की तरफ से यह कहा जाना है कि मीडिया को नियमित करने की कोई भी संहिता उसके भीतर से निकलनी चाहिए।

यह फैसला लोकहित में प्रयोग किए जा रहे अभिव्यक्ति के अधिकारों और उस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक उपकरणों के पक्ष में है। मीडिया का एक काम जासूसी करना है और उसके उस काम को कोर्ट के फैसले में स्पष्ट मान्यता मिली है। इससे पहले पैसे लेकर लोकसभा में सवाल पूछने के मामले पर भी किए गए स्टिंग ऑपरेशन को संसद ने जायज ठहराया था। यानी विधायिका और न्यायपालिका जैसी दो महत्वपूर्ण संस्थाओं ने स्टिंग के बहाने मीडिया की आक्रामकता को मान्यता दे दी है। मर्यादा और संतुलन के पक्ष में खड़ा यह न्यायिक निर्णय किसी को बहकने और अपनी सीमाएं लांघने की छूट नहीं देता। वह मीडिया के खराब आचरण की निंदा करता है और आत्मसंयम की अनिवार्यता भी बताता है, साथ ही उन वकीलों को संयम बरतने की सलाह देता है, जो अदालत में लंबित मामलों के अभियोजन से जुड़े होने के बावजूद चैनलों पर धड़ाधड़ विचार व्यक्त करते रहते हैं। भारतीय लोकतंत्र के विकास में टीवी पत्रकारिता का योगदान तेजी से बढ़ा है, आज जरूरत उसे स्वस्थ और गरिमापूर्ण बनाए रखने की है।

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