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जवान दिखने का जुनून कहीं आपकी बीमारी तो नहीं

यकीन करना होगा कि सफलता, शोहरत और संतुष्टि की राह शरीर से होकर जाती है। शरीर यानी आपके नैन-नक्श, आपकी त्वचा की रंगत, बालों की चमक, पुष्ट काया वगैरह-वगैरह। एक ललक है या यूं कहें कि सनक है कि हैं 66 के लेकिन दिखें 16 के। आज की रंगीन, चमकती-दमकती दुनिया में सफलता के लिए मेकओवर का मंत्र पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ा जा रहा है। मामला हट के है यानी थोड़ा टच करके काया का बहुत कुछ बदला जा सकता है। पूरा का पूरा पैकेज है। आप चुनिए तो सही, बताइए तो सही कि क्या बनना है- थोड़ा हॉट, थोड़ा सेक्सी, थोड़ा बोल्ड या फिर थोड़ा ब्यूटीफुल। पैसे की परवाह किसे है। मनचाहा काम तो मनचाहा दाम।

सहज श्रृंगार कब मेकओवर बन गया, कहा नहीं ज सकता। लेकिन अब तो इसी का जोर है। शो बिजनेस के खेल में इसके बिना कोई भाव नहीं मिलेगा। श्रीदेवी हों या शिल्पा शेट्टी या फिर शाहरुख या आमिर खान, सब ने खुद को बदला है। लेकिन ये तेज रफ्तार जल्द बदलाव लाती है। जो आज है वह कोई जरूरी नहीं कि कल भी रहे। आज जो हेयर स्टाइल कहर ढा रहा है, वह कल उबाऊ हो जाता है। क्या करें, क्या न करें, यह सोचने की फुर्सत नहीं है किसी के पास। नाक ठीक करानी है, दांत चमचमाते हुए और एक सीध में कराने हैं, बॉडी बिल्डरों से मसल्स बनाने हैं। कहने का मतलब इतना ही है कि अलग दिखना है और जवान दिखना है। बढ़ती उम्र को मात देनी है। सर्जरी है, क्रीमें हैं, जिम है, डाइट चार्ट है। जवानी भला बच कर कहां जाएगी। मजे की बात यह कि ऐसा सोचने और करने वालों में शेखर सुमन, पूजा भट्ट या गोविन्दा ही नहीं, महानगरों और शहरों-कस्बों में रहने वाली जया,  मुक्ता और राम-श्याम भी हैं।

अब सिर्फ उम्र पचपन की और दिल बचपन का कहने और मानने से काम नहीं चलेगा। हासिल तो तभी है कि लोग आहें भरते हुए कहें, आपको देख कर आपकी उम्र का अंदाज नहीं लगता। बस समङिाए कि मार लिया मैदान। सारी तकलीफें इसीलिए तो उठाईं थीं और सारा खर्चा इसीलिए तो किया था। चाल, चेहरा और चोला तय किया और उसमें समा गए। कोई आसानी से पहचान ही नहीं पाएगा कि ये वही सलमा या सलीम हैं या अर्चना-अजरुन। सभी खुदा को हैरत में डालना चाहते हैं।

वाकई ऊपर वाला हैरत में ही है कि उसने तो सब में कुदरत को उतारा था जो समय का आईना भी थी। यह भी हैरत की बात है कि उम्र को झूठा साबित करने की होड़ में लगे ये तमाम चेहरे जानते हैं कि कुछ भी शाश्वत नहीं है। शरीर नश्वर है। माइकल जैक्सन इसका आज सबसे सटीक उदाहरण है। उसने अपने शरीर का क्या हाल बना लिया था, यह सब ने जाना। लेकिन उसकी शोहरत का वजन उसकी तकलीफ से अधिक जान पड़ता है। अलग दिखने और अलग करने की धुन में आप अपने आपको कितनी प्रताड़नाओं से गुजर सकते हैं, यह तो आपको ही तय करना है। लेकिन ऐसी असामान्य सोच के पीछे कहीं ऐसा तो नहीं कि यह कोई रोग हो?

जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारीख कहते हैं कि खुद को प्रस्तुत करने और अपनी पहचान बनाने के लिए आज लोगों में फैशन के प्रति ललक बढ़ी है। अपने लुक्स के बारे में एक खास उम्र के लोग (50-60) बेहद संजीदा हो गए हैं। डॉ. पारीख कहते हैं कि अपने आपको सजने-संवारने की बात एक हद तक तो ठीक है, लेकिन जब वह बीमारी की हद तक बढ़ जए तो खराब है। कुछ लोग इस बीमारी से ग्रसित हो जते हैं जिसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘बॉडी डिसमर्फिक डिसॉर्डर’ कहते हैं।

डॉ. समीर के अनुसार मीडिया के कारण अधेड़ों में फैशन को लेकर एक खास उत्साह जागा है। मीडिया एक रोल मॉडल तय कर देता है। ये रोल मॉडल और उनका पहनावा और स्टाइल बदलते रहते हैं। इन सब का लोगों पर निश्चित रूप से असर पड़ता है। मीडिया की मेहरबानी से जानकारी की इतनी नई परतें एक के बाद एक खुल कर सामने आने लगी हैं कि उनके पास विकल्पों की कोई कमी नहीं रही है। लोगों में आई इस नई चेतना ने उन्हें अपने से इतना प्यार करना सिखा दिया है कि वह अपने शरीर में थोड़ी-सी कमी को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।

जहां तक सेलेब्रेटीज की बात है तो उनकी आजीविका ही लुक्स पर निर्भर है। वे कैसे इतने खूबसूरत दिखाई दें कि लोग उनके सम्मोहन से बाहर न निकल पाएं। इस बात को लेकर वे इतना चिंतित रहने लगते हैं कि उनकी भूख मर जाती है और उनमें खून की कमी और प्रोटीन व हारमोंस असंतुलन की स्थिति आ जाती है। इस कारण उनमें जल्दी थकान, चिड़चिड़ापन, ब्लड प्रेशर, तनाव आदि के लक्षण भी देखने को मिलते हैं। ऐसे लोग हीनभावना के शिकार होते हैं और उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। ये सारी स्थितियां उन्हें मनोरोगी बनाने में सहायक सिद्ध होती हैं। बार-बार मेकओवर कराने से भी उनका प्राकृतिक स्वभाव ही बदल जाता है।

डॉ. पारीख कहते हैं कि लुक्स को किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। यह पूरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा भर है। सिर्फ लुक्स लेकर आप कहीं गए और व्यक्तित्व के अन्य पहलू गायब हैं तो आपकी सफलता निश्चित तौर पर संदेह के घेरे में है। डॉ. पारीख लुक्स के लिए बीमारी की हद तक पहुंचने से पहले आगाह करते हैं कि जीवन को पूरी समग्रता में देखें, टुकड़ों में नहीं। आत्मविश्वास तभी जगेगा जब लुक्स के अलावा ज्ञान, बोलचाल का ढंग और अन्य बातें व्यक्तित्व में समाहित होंगी।

लुक के साथ बदलता है आपका व्यवहार भी
अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक जेरेमी बेलेनसन और निक्की पी ने इंसानी मेकओवर के बाद दिमागी हाल की स्टडी की है। इसमें वार्डरोब की पसंद-नापसंद शामिल नहीं की गई। स्टडी थी नए लुक्स या नए अवतार पर। जेरेमी बेलेनसल कहती हैं,‘आप की शारीरिक दिखावट और बनावट का बदलना लोगों के आपके प्रति बर्ताव को भी बदलता है। दूसरों का आपके प्रति व्यवहार काफी हद तक आपके लुक पर निर्भर करता है और आप खुद भी मेकओवर के नए रूप में अलग व्यवहार करते हैं।’ इसे दोनों अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों ने ‘दा प्रॉटियस इफेक्ट’ करार दिया है। यह नाम रखा गया है रूप बदलने वाले ग्रीक देवता पर। नए रूप से बर्ताव में बदलाव रुहानी दुनिया से असल जिंदगी तक जाता है।

स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी के दौरान कई स्वयंसेवी सब्जेक्ट्स को आकर्षक से सादा मेकओवर दिया गया है। तथ्य उभरा कि दुनिया वाले लुभावने व्यक्तित्व वालों की हर चाहत पूरी करने के लिए तरफदारी करते हैं। इनमें ईमानदारी, दरियादिली और इंसानियत तक शामिल है। इसी का नतीजा है कि लोगों की नजर में, आकर्षक लोगों में बेढंगों के मुकाबले ज्यादा आत्मबल भरता है।

फिर नए मेकओवर के सब्जेक्ट्स को एक साथ एक कमरे में बैठा दिया गया। सभी कमरे में एक-दूसरे से घुलते-मिलते रहे। देखा गया कि आकर्षक लुक्स वाले अनजन व्यक्ित से भी तीन फीट तक नजदीक आए, जबकि साधारण छाप वाले उनसे दोगुनी दूरी पर रहे। तय है कि आकर्षक मेकओवर आत्मविश्वास बढ़ाता है और इससे दोस्ती पनपती है। लोग बाग ‘मैं ऐसा क्यों हूं’ या ‘मैं वैसा क्यों हूं’ के चक्कर में परेशान हो उठते हैं। जैसे हैं, वैसे में खुश रहना चाहते तो हैं, लेकिन हमेशा खुद की दूसरों से तुलना करते हैं। ऐसे में आत्मग्लानि का भाव मन में खेद भावना को जन्म देता है। अपनी कमी महसूस करते हुए, मन में शिथिलता और खिन्नता होती है।

हर मेकओवर से मिलता है ‘नया रूप’ और फिर ‘नई जिंदगी’। मेकओवर की तरह रिएलिटी शो ‘नया रूप नई जिन्दगी’ का मकसद है बेकार और बेढंग की जिंदगी को दुरुस्त करने की कोशिश। बदनुमा धब्बा ङोलते और गुमशुदगी की जिंदगी गुजरते ऐसे तमाम लोग हैं जिन्हें परिवार ने तो अपनाया है, लेकिन समाज ने नामंजूर कर दिया है। अभिनेत्री मोना सिंह का कहना है, ‘जस्सी के मेकओवर कमाल के दिनों में ही, मुझे चैनल से एक्सट्रीम मेकओवर पर आधारित शो होस्ट के लिए पेशकश आने लगे थे। मैं खुश हूं कि जस्सी की बदौलत मेकओवर का ट्रेंड तो शुरू हुआ ही है।’

शो की एक्सपर्ट टीम ने दस एक्सट्रीम मामलों को असली मेकओवर के लिए चुना है। हर एपिसोड खोलता है मेकओवर के विभिन्न चरणों का ब्यौरा और बताता है मेकओवर की पूरी प्रक्रिया। सजर्री के बाद की रिकवरी का दौर जिसमें  काफी वक्त लगता है। इस बीच, उम्मीदवार को परिवार के सदस्यों से नहीं मिलने दिया जाता। यह शो की जरूरत है, ताकि सरप्राइज दिया जा सके। हर एपिसोड में दर्शक गवाह हैं दौर-दर-दौर मेकओवर के और इसी पर वे फिदा भी होते हैं।

सोशल फोबिया से बाहर निकलना है
स्टेनफोर्ड के वैज्ञानिकों की हालिया मेकओवर स्टडी का मकसद यह जताना कतई नहीं रहा कि नई बदली हॉट लुक्स जीवन की दूसरी पारी में दोस्त, पैसा, पावर और अन्य लग्जरी तामझाम का अम्बार लगाती है या नहीं। ऐसा बेशक होता है, लेकिन मेकओवर का असल मनोवैज्ञानिक महत्व थैरेपी के तौर पर होता है। सोशल फोबिया से ग्रस्त पीढ़ी में आत्मबल और दोस्ताना माहौल का संचार होता है।

देखा गया है कि मेकओवर में महज डॉक्टर का सफेद कोट दोस्ती का पैगाम ले आता है। लोग डॉक्टर से दोस्ती करने के आतुर होते हैं। लुभाने का यह दौर कितने समय तक जारी रहता है, अंदाज नहीं। हालांकि कुछ घंटों के लिए ही सही, इसमें सम्भावनाएं तो जबर्दस्त हैं।

तय है कि मेकओवर से सपना साकार करने का मौका हाथ लगता है। जोनी, शामीन, स्लेशा वगैरह के मेकओवर से टीवी दर्शक रू-ब-रू हुए हैं। स्लेशा को दांतों की खासी तकलीफ थी। उसका सपना था मॉडल बनने का, लेकिन दांत आड़े आ रहे थे। जोरदार मेकओवर के बाद उसने सपना पूरा करने की ठान ली है। शादी की नाउम्मीदी में जी रही लड़कियों को मेकओवर के बाद रिश्ते आने लगे हैं।

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